विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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मार की और अनेक प्रसिद्ध मदिरो एव देवमूर्त्तियो को भग्न
किया। उसके उत्तराधिकारियो के समय मे कुछ छुटपुट हमले
मध्यप्रदेग पर हुए, किन्तु उनका राज्यविस्तार प्राय पश्चिमी
पजाव तक ही सीमित रहा।१
१२वी शती ई० के अन्तिम दगक मे गजनी के मुलतान
गिहाबुद्दीन मुहम्मद गोरी ने भारतविजय के उद्देग्य से मध्यप्रदेग
पर आक्रमण किये और अन्तत दिल्ली-अजमेर के चौहान नरेग
पृथ्वीराज को तथा कन्नौज के गाहडवाल राजा जयचन्द को समाप्त
करके तथा मोहवा के परमाल चन्देल और गुजरात आदि के
कई अन्य राजाओ को पराजित करके वह दिल्ली को केन्द्र बना-
कर उत्तरभारत में मुस्लिम राज्य की स्थापना करने मे सफल
हुआ। अनुश्रुति है कि इस सुलतान ने अपनी मलिका के आग्रह
पर एक दिगम्बर जैन मुनि को अपने दर्वार मे बुलाकर सम्मानित
किया था। कुछ के अनुसार यह घटना अजमेर मे घटी थी और
वह साधु भट्टारक वसन्तकीर्त्ति थे, जिन्हे उस अवसर पर खण्ड-
वस्त्र धारण करना पडा था—कहते हैं कि तभी से वस्त्रधारी
दिगम्बर भट्टारको की प्रथा प्रचलित हुई।२
वस्तुतः, विदेगी, विजातीय, विधर्मी एव अजनबी मुसलमानो
और उनके धर्म एव सस्कृति के प्रविष्ट होने तथा उनकी राज्य-
सत्ता के देश के हृत्स्थल मे स्थापित हो जाने के अनेक तत्काल
एव चिरव्यापी क्रान्तिकारी परिणाम हुए, जिनने देश की राज-
नीति और अर्थव्यवस्था को ही नही, उसकी सस्कृति, धर्मो और
१ देखिए—भारतीय इतिहास - एक दृष्टि ( द्वि० सं०, १९६६ ई० ),
पृ० ३१३-४०० ।
२ वही, पृ० ४००-४०४, तथा 'प्रमुख ऐतिहासिक जैन पुरुष और
महिलाए' ( १९७५ ), पृ० २३८-२३९ ।