सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 28, कुल 442 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 28

कुमारी पर्यन्त उत्तर-पश्चिम मे तक्षशिला से लेकर पूर्वीतटवर्ती
भुवनेश्वर पर्यन्त, और उत्तर-पूर्व मे असम एवं बागला देश से
लेकर पश्चिमी समुद्रतट पर्यन्त इस महादेश भारतवर्ष मे बिखरे
पड़े हैं। देश का कोई राज्य, प्रान्त या प्रदेश ऐसा नही है जिसमे
एक या एक से अधिक जैन तीर्थ विद्यमान न हो। अनेक प्राचीन
तीर्थ विच्छिन्न अथवा विस्मृत भी हो गये और उनके स्थिति-स्थल
को खोजना या चीन्हना दुष्कर हो गया है। कई की स्थिति या
पहचान के विषय मे मतभेद उत्पन्न हो गये और एकाधिक स्थानो
से उनकी चीन्ह की जाने लगी। ऐसे भी अनेक तीर्थ हैं जो गत
साधिक एक सहस्र वर्ष के बीच ही—पूर्व मध्यकाल एव मध्यकाल
मे ही उदय में आये अथवा प्रसिद्धि को प्राप्त हुए हैं।
जिन तीर्थों की यात्रा का क्रम अविच्छिन्न बना रहा, उनकी
स्थिति निर्भ्रान्त बनी रही, उनका अल्पाधिक विकास भी होता
रहा और संरक्षण भी हुआ। किन्तु काल-दोष से—अनेक राज-
नैतिक, सामाजिक, आर्थिक, भौगोलिक आदि कारणो से कई
तीर्थों की यात्रा विच्छिन्न हो गई और वे विस्मृति के गर्भ मे
विलीन होते गये। ऐसी दशा मे तीर्थविषयक साहित्य ही ऐसा
आधार रह गया जिसके द्वारा अधुना अज्ञात या विस्मृत तीर्थो का
नाम जीवित रहा और ज्ञात तीर्थों के सम्बन्ध मे भी अनेक ऐसे
तथ्य एवं वृत्त सुरक्षित रह सके जिन्हे लोकमानस ने विस्मृत
कर दिया था और जिनके सत्यापन का भी अब प्राय कोई उपाय
नही रह गया है।
मूल प्रतिक्रमण पाठ के विसीहदण्डक मे, कुन्दकुन्द कृत प्राकृत
भक्तियो एवं निर्वाणकांड मे, पूज्यपादीय सस्कृत भक्तियो मे यति-
वृषभकृत तिलोयपण्णत्ति मे, आगमसूत्रो और उनकी निर्युक्तियो,
चूर्णियो, भाष्यो, टीकाओ मे, पुराण एवं कथा साहित्य मे, पट्टा-