विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्राप्त किये बताये जाते है। कहा जाता है कि श्वेताम्बराचार्य
रामचन्द्रसूरि और जिनचन्द्रसूरि को भी उसने सम्मानित किया
था। सुलतान का फरमान एव सहायता प्राप्त करके सेठ पूर्णचन्द्र
गिरनार तीर्थ की यात्रा के लिए एक बडा सघ लेकर गया था।
उसी समय पेथडगाह के नेतृत्व मे वहाँ गुजरात का भी एक बडा
संघ आया था, और दोनो सघो ने सद्भावपूर्वक साथ-साथ तीर्थ
वन्दना की थी। गुजरात के सूबेदार अलपखाँ ने भी पाटन के सेठ
समरागाह को शत्रुजय तीर्थ का उद्धार करने और यात्रासघ ले
जाने के लिए सैनिक सहायता सहर्ष प्रदान की थी। अलाउद्दीन के
उत्तराधिकारी मुबारकशाह खलजी (१३१६-१३२० ई०) ने सेठ
समरागाह को दिल्ली 'बुलाकर एक उच्च पद पर नियुक्त किया
बताया जाता है। तुगलुक वश का सस्थापक गयासुद्दीन तुगलुक-
गाह (१३२१-१३२५ ई०), जिसको माँ एक हिन्दू जाटनी थी
और जो भारत मे ही जन्मा था, स्वभावत क्रूर और धर्मान्ध
नही था। सेठ समराशाह को वह पुत्रवत् मानता था और उसे
उसने एक उच्च पद देकर तेलगाना भेजा था। सोमचरित्रगणिकृत
'गुरुगुणरत्नाकर' (१४८५ ई०) के अनुसार सूर और वीर
(या नानक) नाम के प्राग्वाटजातीय दो जैन भ्राता भी इस
सुलतान के प्रतिष्ठित सरदार थे। दिल्लीनिवासी सेठ रथपति ने
शाही फरमान प्राप्त करके १३२३ ई० मे ससघ तीर्थ यात्रा की थी
जिसमे पाँच मास का समय लगा था। इन तथ्यो से स्पष्ट है कि
विजयार्थ या विद्रोहदमनार्थ किये गये युद्धो के अवसरो को छोडकर
इस काल मे भारतीयो को सामान्यतया स्वधर्मपालन की सीमित
स्वतन्त्रता प्राप्त थी और उन्हे यदा-कदा शासनकार्य मे उच्च पद
भी दिये जाने लगे थे।
गयासुद्दीन का पुत्र एव उत्तराधिकारी उलुगखाँ उर्फ जूनाखाँ
था जिसने मुहम्मद विन तुगलुक नाम से १३२५ से १३५१ ई०