विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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मे से प्रत्येक पर दो-दो। कन्यानयन-महावीर पर दूसरा कल्प
( न० ५१ ) तथा पंचकल्याणक स्तवन ( न० ५६ ) अन्यकर्तृक
हैं। इस प्रकार कुल केवल ३६ विभिन्न तीर्थ स्थानो के कल्प इस
ग्रन्थ मे प्राप्त हैं। आचार्य ने कर्त्तारूप मे अपना नाम अथवा
सकेत १९-२० कल्पो मे ही किया है। सभावना यही है कि शेष
भी उन्होने ही रचे होगे, किन्तु यह निश्चयपूर्वक कहना कठिन है
कि उनमे से कोई भी भिन्नकर्तृक नही है। कल्प न० ४५ मे
तन्त्र के जानकारो से प्राप्त सूचना के आधार पर जिन प्रसिद्ध
८४ तीर्थों की सूची दी हैं, उसके विषय में स्वयं स्वीकार किया है
कि 'इनमे से कुछ ही देखे हैं, शेष के विषय में सुना है।' इस सूची
मे एक-एक तीर्थ का कई बार उल्लेख हुआ है, एक स्थान से
सम्बधित कई तीर्थों का भी पृथक्-पृथक् उल्लेख किया है, और
कई तीर्थ, यथा क्रौंचद्वीप, हंसद्वीप, लका, पाताल लका, त्रिकूट
गिरि, कैलाश, अष्टापद आदि भारतवर्ष के बाहर हैं। जैन परम्परा
मे मान्य सभी तीर्थ इस सूची मे समाविष्ट नही हैं, और अधिकांश
तीर्थ अतिशय क्षेत्र हैं।
जिन विभिन्न वास्तविक ३६-३७ तीर्थ स्थानो का परिचय
आचार्य ने इस कल्प-प्रदीप मे दिया है वे गुजरात, राजस्थान,
मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, पंजाब-हरियाणा, विहार, महाराष्ट्र,
आन्ध्र और कर्नाटक जैसे विभिन्न प्रदेशो मे अवस्थित है। उनमे
से अधिकतर ऐसे है जिनको आचार्य ने स्वयं यात्रा की लगती है,
और कई ऐसे हैं जिनकी यात्रा तो वे नही कर पाये किन्तु उनके
विषय मे जैसा जाना-सुना, लिख दिया है। जिन तीर्थों को
उन्होने स्वयं देखा उनके विषय मे तो बहुत कुछ जैसा देखा
वैसा लिखा, साथ ही स्थानीय किवदंतियो अथवा पूर्ववर्ती
साहित्यिक या मौखिक अनुश्रुतियो से जो जाना, वह भी लिख