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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 34

प्रस्तावना १३
१३२८ मे वह सर्वप्रथम उसके सम्पर्क मे आये और संभवतया
१३३३ ई० मे, लगभग ७२ वर्ष की आयु मे दिल्ली मे ही दिवंगत
हो गये थे ।१
विविध तीर्थ-कल्प, जिसका अपर, वल्कि मूल, नाम 'कल्प-
प्रदीप' है,२ आचार्य जिनप्रभसूरि की छोटी-बड़ी शताधिक रचनाओ
मे अनेक दृष्टियो से सर्वोपरि महत्त्व रखता है। लोक मे उनकी
प्रसिद्धि मुख्यतया इसी ग्रन्थ के कर्त्ता के रूप मे है। जैन विद्वानो
के अतिरिक्त अनेक जैनेतर प्राच्यविद एवं इतिहासकार भी उससे
परिचित हुए हैं, और इसमे चर्चित तीर्थों के विवेचन मे तथा उसमे
उल्लिखित कतिपय अनुश्रुतियो की ऐतिहासिकता पर ऊहापोह
१ आचार्य जिनप्रभसूरि का संक्षिप्त-जीवन परिचय मुनि जिनविजय जी
द्वारा सम्पादित एव सिंधी जैन ग्रन्थमाला, कलकत्ता से १९३४ ई०
में प्रकाशित 'विविध तीर्थ-कल्प' (मूल) की भूमिका में, श्री अगरचन्द
नाहटा द्वारा 'विविध मार्ग-प्रपा' के प्रारम्भ में, तथा श्री लालचन्द-
भगवान गांधी की गुजराती पुस्तक 'जिनप्रभसूरि अने सुलतान
मुहम्मद' में प्राप्त होता है। श्री अगरचन्द नाहटा द्वारा १९७५ में
प्रकाशित एव महोपाध्याय विनयसागर जी द्वारा लिखित पुस्तक
'शासन प्रभावक आचार्य जिनप्रभ और उनका साहित्य' में तो
आचार्य के जीवनवृत्त, गुरु-शिष्यपरम्परा, व्यक्तित्व, सुलतान
मुहम्मद तुगलक के साथ उनके सम्बन्धो, उनके चमत्कारो और
प्रभावक कार्यों तथा उनकी साहित्यिक कृतियो पर विस्तारपूर्वक
विचार किया गया है।
२. ग्रन्थ की अन्त्य प्रशस्ति में 'कल्पप्रदीपनामायं ग्रन्थो विजयतां
चिरम्', तथा उसके उपरान्त दी हुई पुष्पिका में 'इति श्रीकल्प-
प्रदीप ग्रन्थ समाप्त' रूप से स्वयं ग्रन्थकार ने अपनी कृति का
नाम 'कल्पप्रदीप' ही सूचित किया है।