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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 37

१८ विविध तीर्थ-कल्प

लगता कि अमुक तीर्थक्षेत्र श्वेताम्बर है, अमुक दिगम्बर है।
जिन मदिरो एव जिन-प्रतिमाओ के विषय मे भी यही स्थिति
थी । जैनेतरो के लिए तो दिगम्बरो और श्वेताम्बरो मे कोई
भेद ही नही था—दोनो समान रूप से 'सरावगान' ( श्रावक )
कहलाते थे, क्योकि जैन गृहस्थो के लिए उस काल मे यही गव्द
बहुप्रचलित था ।
आचार्य जिनप्रभ गास्त्रज्ञ विद्वान थे, साथ ही जिनभक्त,
तीर्थभक्त श्रद्धालु साधु थे । मन्त्र-तन्त्र, चमत्कारो और अतिगयो
मे उनका सहज विश्वास था । वह युग भी तान्त्रिक युग था, नाथ-
सम्प्रदायी जोगियो का यत्र-तत्र बाहुल्य था, मुसलमान सूफी
फकीर भी चमत्कारो का आश्रय लेते थे । इस प्रकार के विश्वास
उस काल मे लोकप्रचलित थे । विविध तीर्थकल्प मे वर्णित अनेक
चमत्कार ऐसे हैं, जिनकी विभिन्न जिन प्रतिमाओं के प्रसग मे
पुनरावृत्ति हुई लगती है, और कई एक अन्यत्र भी हुए सुने गये
हैं । आज के वैज्ञानिक दृष्टि से प्रभावित तार्किक मानस को वे
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