विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ
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प्रस्तावना · १५
यथा सत्यपुर-साचौर तीर्थ कल्प ( न० १७ ) १३१० ई० के वाद
कभी रचा गया है, अर्बुदगिरि कल्प ( न० ८ ) १३२१ ई० के
उपरान्त रचा गया, और कन्यानयननीय महावीर प्रतिमा कल्प
( न० २२ ) १३२८ ई० के उपरान्त, सम्भवतया १३३१-३२ ई० मे
रचा गया। इस कल्प का पूरक ( न० ५१ ) तो आचार्य के देहान्त
के पर्याप्त समय बाद रचा गया प्रतीत होता है—उसे उनके विद्या-
शिष्य संघतिलक सूरि के पट्टधर विद्यातिलक अपर नाम सोम-
तिलक सूरि ने रचा था, जिनके कुमारपालप्रबन्ध का रचनाकाल
१३६७ ई० है। अस्तु, कल्प-प्रदीप के विभिन्न कल्पो की रचना
आचार्य ने १३०७ से १३३२ ई० पर्यन्त लगभग २५ वर्षा के बीच
की थी। दो-चार की रचना १३०७ के पूर्व भी की गयी हो सकती
है। रचना-स्थलो मे न० १ और २२ दिल्ली मे रचे गये प्रतीत
होते हैं, न० २१ देवगिरि मे रचा गया और न० ५० हस्तिनापुर
में। शेष मे से कुछ विवक्षित तीर्थ स्थानो पर भी रचे गये हो
सकते हैं और अन्यत्र भी। भाषा की दृष्टि से २२ कल्प सस्कृत मे
और शेष प्राकृत मे रचित हैं।
पुस्तकगत कुल ६३ कल्पो मे एक तो अन्त्य प्रशस्ति के रूप
मे है, एक ( न० ४५ ) मे ८४ तीर्थो की सूची है, कई कल्प
स्तवन-स्तोत्र आदि के रूप मे हैं, नन्दीश्वर द्वीप जैसे मिथिक
स्थलो के तथा अष्टापदⁿ जैसे अनिश्चित आकार-प्रकार व स्थिति
के तीर्थों के भी कल्प है। कई तीर्थों पर एकाधिक कल्प रचे हैं,
यथा उज्ज्यन्त ( रैवतगिरि या गिरनार ) पर चार, प्रतिष्ठान पर
तीन और पावापुरी, ढीपुरी, हस्तिनापुर, अष्टापद, एव स्तभनक
ⁿ इस पर्वत की ऊँचाई ८ योजन (लगभग १०० किलोमीटर) और
स्थिति अयोध्या से १२ योजन (लगभग १५० कि० मी०) उत्तर में
[···]—इन दोनो ही बातो का प्राचीन परम्परा से सम्बन्ध है।