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सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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नही होती उन्हे जैन नही मानते' ( अत्र च यदसम्भाव्य क्वचि-
दूचे तत्र परसमय एव मन्तव्यो हेतुर्यन्नासंगतवाग्जनो जैन ) ।
काश, अपनी परम्परा से सम्बन्धित चमत्कारो आदि के विषय मे
भी आचार्य ऐसी परीक्षाप्रधान तार्किक दृष्टि रख पाते ।
उज्जयन्त (गिरनार), आर्हच्छत्रा, मथुरा, कौशाम्बी, अपापा-
पुरी (पावापुर), हस्तिनापुर, मिथिला, रत्नवाहपुर (रत्नपुरी),
श्रावस्ती, वाराणसी प्रभृति सर्वमान्य प्रसिद्ध तीर्थों का जिनप्रभसूरि
ने जितना और जो आँखो देखा वर्णन किया है, उससे स्पष्ट है
कि उन क्षेत्रो मे उस समय ऐसे अनेक धार्मिक स्मारक आदि
विद्यमान थे जिनका अब वहाँ कोई चिह्न भी शेष नही है । उनसे
सम्बन्धित ऐसे कई अतिशय या चमत्कार भी, जो तब प्राय
प्रत्यक्ष अनुभव मे आते थे, अब चिरकाल से विस्मृत हो चुके हैं ।
भगवान महावीर के पूर्ववर्ती कालो मे घटित घटनाओ के
वर्णन मिथिक प्रकृति की पौराणिक अनुश्रुतियाँ मात्र हैं, जो
धार्मिक श्रद्धा के आधार पर ही मान्य किये जा सकते हैं । परन्तु
भगवान महावीर के समय से लेकर लगभग १००० ई० पर्यन्त की
अनुश्रुतियाँ बहुधा इतिहासाधारित हैं यद्यपि उनमे अनुमान,
कल्पना और पौराणिकता का भी अल्पाधिक मिश्रण है । उनमे
निहित तथ्यांगो के सत्यापन की आवश्यकता है । उदाहरणार्थ
( कल्प नं० २६ मे ) वि० स० ५०२ मे अन्हिलपुर पाटन मे एक
पेड के नीचे तीन प्रतिमाओ का भूगर्भ से निकलना; म०स० (वीर
निर्वाण) ९९३ (सन् ४६६ ई०) कालिकाचार्य द्वारा सवत्सरी की
तिथि मे परिवर्तन (न० २३) - कुछ विद्वान् इन कालकाचार्य को
ईसापूर्व प्रथम शती के मध्य मे लगभग रखते हैं । प्रतिष्ठानपुर की
स्थापना और सातवाहन नरेशो का चरित्र ( न० २३, ३३, ३४ )
तथा श्रीपुर तीर्थ एव कुष्ठी राजा श्रीपाल का आख्यान (न० ५८)
ऐतिहासिक दृष्टि से विचारणीय हैं । कोल्लपाक माणिक्यदेव