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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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२८ विविध तीर्थ-कल्प
पर्यन्त गासन किया । दिल्ली के सुलतानो मे उसका राज्य
सर्वाधिक विस्तृत एव शक्तिशाली था और पूर्व मुगलकालीन भारत
का वह सम्भवतया सर्वमहान मुसलमान नरेग था । उसका व्यक्तित्व
अनेक विरोधी तत्त्वो का मिश्रण, अतिविचित्र एव विवादास्पद
रहा है । जहाँ वह सुशिक्षित, वहुभाषाविज्ञ, दर्गन, न्याय, तर्क,
चिकित्सा शास्त्र आदि विविध विद्याओ और ज्ञान-विज्ञानो मे
पारंगत विद्यारसिक स्वतन्त्र विचारक, साधु-सन्तो और विद्वानो
का समादर करने वाला, परमतसहिष्णु, उदार, दानगील,
न्यायप्रिय, आविष्कारबुद्धि-सम्पन्न, सदाचारी और वीर योद्धा था,
वहाँ साथ-ही-साथ बहुत क्रोधी, उतावला, अधीर, अदूरदर्गी
अव्यावहारिक, निरंकुश, क्रूर, निर्दयी और कुछ सनकी भी था ।
स्वय अपने पिता की मृत्यु मे उसका हाथ रहा माना जाता है,
और उसी के सचित धन से उसने विरोधी सरदारो का मुह वन्द
किया । अपराधियो, विशेषकर विद्रोहियो को वह अत्यन्त कठोर
एव अमानुषिक दण्ड देता था, और इस विपय मे पद, वर्ग या
सम्बन्ध का भी लिहाज नही करता था । अपने सगे भानजा, कई
उच्च पदाधिकारियो और एक काजी को भी उसने खुले आम
मृत्यु-दण्ड दिया था । उसके सनकी स्वभाव और राजधानी का
परिवर्तन, तावे के सिक्के चलाना, चीन का आक्रमण प्रभृति
विचित्र योजनाओ एव अभियानो के कारण उसके मरते ही
सल्तनत का द्रुत वेग से पतन होने लगा और एक-एक करके प्राय
सभी प्रान्तीय सूवेदार स्वतन्त्र हो गये ।
इस सुलतान की विफलता एक सबसे वडा कारण |मुल्ला-
मौलवियो का क्षोभ एव विरोध था, जो उससे डरते भी थे,
चिढ़ते भी थे और उसके विरुद्ध विद्रोहो को उभारते रहते थे ।
मध्यकालीन मुसलमानी तवारीखे ( इतिहास-ग्रन्थ ) भी अधि-
काशत मुल्ला-मौलवियो द्वारा ही लिखी गयी, और उनमे उन्होने