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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 442 में से

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पृष्ठ 31

करने मे इस ग्रन्थ का उपयोग हुआ है । लगभग एक सौ वर्ष पूर्व
पीटरसन ने सस्कृत के हस्तलिखित ग्रन्थो की अपनी चतुर्थ रिपोर्ट
मे विविध तीर्थ कल्प का उल्लेख किया था; एस पी पडित ने
वाक्पतिकृत प्राकृत काव्य 'गउडवहो' के स्वसम्पादित सस्करण
की भूमिका मे विविध तीर्थ-कल्प के मथुरापुरी कल्प मे वर्णित
बप्पभट्टिसूरि एव आमराज के प्रसग का उल्लेख किया था, डा०
वुहलर ने मथुरा के स्वसपादित शिलालेखो की प्रस्तावना मे तथा
'ए लीजेन्ड आफ दी जैना स्तूप एव मथुरा' ( १८९७ ई० ) मे
उसका उपयोग किया है । कालान्तर मे प नाथूराम प्रेमी, डा०
वासुदेवशरण अग्रवाल, प्रो० कृष्णदत्त वाजपेयी, नाहटा जी,
स्वयं हमने, तथा अन्य अनेक विद्वानो ने जिनप्रभसूरि के विविध
तीर्थ-कल्प का उपयोग किया है ।
अन्त्य प्रशस्ति के अनुसार यह ग्रन्थ 'भूमडल के इन्द्र (अधिपति
या स्वामी) श्री हम्मीर महम्मद ( अमीर अर्थात् सुलतान, मुहम्मद
विन तुगलुक ) के राज्य मे, योगिनीपत्तन ( योगिनीपुर, दिल्ली )
मे भाद्रपद कृष्ण दशमी बुधवार, विक्रम सवत् १३८९
( सन् १३३२ ई० ) मे पूर्ण हुआ था । अनुष्टुप्मान से इसका श्लोक
परिमाण ३५६० था । ग्रन्थ मे कुल ६२ कल्प या प्रकरण सकलित
है, जिनमे से केवल ६ के अन्त मे उनकी रचना-तिथि दी गयी है—
वैभारगिरि-कल्प—क्रमांक ११ (१३०७ ई०), शत्रुजय तीर्थ-कल्प—
क्रमांक १ ( १३२८ ई० ), ढिपुरीस्तव-क्रमांक ४४ ( १३२९ ई० )
अपापा वृहत्कल्प—क्रमांक २१ ( १३३० ई० ), हस्तिनापुर तीर्थ
स्तवन—क्रमांक ५० (१३३१ ई०), और श्री महावीरगणधर-कल्प—
क्रमांक ३९ ( १३३२ ई० ) । शेष कल्पो मे उनकी रचना की
तिथि सूचित नही की गई है । किन्तु कुछ कल्पो की रचना-तिथि
अनुमान की जा सकती है, उनमे दिये गये संदर्भों के आधार पर,