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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 33

१२ विविध तीर्थ-कल्प
सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आचार्य हुए। वह एक बहुभाषाविज्ञ, विविध
विषयनिष्णात, अनेक दीक्षाशिष्यो एव विद्याशिष्यो के गुरु, विपुल
साहित्य-प्रणेता, तीर्थोद्धारकर्त्ता, महान प्रभावक एव राज्य मान्य
जैनाचार्य थे। उनके द्वारा रचित साहित्य मे व्याकरण, कोष,
अलकार, मन्त्रशास्त्र, तीर्थपरिचय, खण्डन-मडन, वैधानिक
रचनाएँ, चरित्र काव्य, स्तोत्र-स्तवन, आगमिक एव अन्य टीकाएँ
आदि, सस्कृत और प्राकृत, गद्य एव पद्य की सैकडो कृतियाँ है।
अकेले स्तोत्र ही उन्होने ७०० रचे थे, ऐसी अनुश्रुति है। उनमे से
लगभग ८५ तो अद्यावधि उपलब्ध है। संकीर्ण साम्प्रदायिक
मनोवृत्ति से वह ऊपर थे। यही कारण है कि श्वेताम्बर सम्प्रदाय
के एक ( खरतर-लघु ) शाखागच्छ के प्रधान आचार्य होते हुए भी
कई अन्य गच्छो के साधु उनके प्रिय विद्याशिष्य थे। दिगम्बरो के
साथ भी उनका अच्छा सद्भाव था, और जैनेतरो मे हिन्दुओ के
प्रति ही नही, मुसलमानो के साथ भी उनका समुचित सद्भाव
रहा। अतएव जनता के प्राय सभी वर्गो से उन्होने आदर प्राप्त
किया। वह ऐसे युगचेता, समयानुसारी प्रवृत्ति के पारखी और
अवसर का लाभ उठाने मे पटु थे कि दिल्ली के तुर्क सुलतान
मुहम्मद बिन तुगलुक की उदार मनस्विता, विद्यारसिकता एव
दार्शनिक रुझान का लाभ उठाकर उन्होने उससे सम्पर्क साधा,
अपने चरित्र एवं प्रतिभा से उसे प्रभावित किया और उससे प्रभूत
सम्मान प्राप्त किया। इतना ही नही, सुलतान की प्रसन्नता का
का उपयोग उन्होने जिन-शासन की प्रभावना, जिन-मन्दिरो,
मूर्त्तियो और तीर्थों के सरक्षण तथा तीर्थों की ससघ यात्राओ के
लिए कई शाही फर्मान प्राप्त करने मे किया। धर्म-प्रभावना के
अपूर्व उत्साह मे उन्होने अपनी वृद्धावस्था, अस्वास्थ्य तथा जैन-
मुनि के वर्षावास आदि नियमो की भी परवाह नही की। इस
सुलतान के साथ उनका सम्पर्क चार-पाँच वर्ष ही रह पाया।