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सर्वकोश
विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 442 में से

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पृष्ठ 36

दिया। ऐसी स्थिति मे कल्प के अन्त मे बहुधा यह भी स्पष्ट
सकेत कर दिया कि 'जैसा सुना या जाना है, वैसा लिखा है !'
अनेक बार तत्कालीन वस्तुस्थिति, ऐतिहासिक तथ्य, दंतकथाओ
आदि पर आधारित सूचनाएं, विशेषकर स्थान या प्रतिमा विशेष
से सम्बन्धित अतिशयो, चमत्कारो आदि के कथन, कुछ इस प्रकार
मिश्रित हो गये है कि आधुनिक अन्वेषक के लिए उनमे से
तथ्यातथ्य को पृथक्-पृथक् करना दुष्कर हो सकता है। तथापि,
आचार्य की मनोवृत्ति, व्यक्तित्व, शैली और सकेतो की पकड़
पा लेने से यह कार्य बहुत कुछ सुगम हो जाता है।
पूरे ग्रन्थ के विश्लेषण से अनेक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य
उपलब्ध होते है, अनेक ऐसी ऐतिहासिक अनुश्रुतियाँ भी प्राप्त
होती है जिनका सत्यापन असंभव नही है, और जितने अगों मे
वे सत्यापित हो जाती है, इतिहास-निर्माण मे अतीव उपयोगी
होगी। तीर्थों के परिचय मे अनेक महत्त्वपूर्ण भौगोलिक सूचनाएँ
भी प्राप्त होती हैं। उस युग की लोकदशा, जैन संस्कृति, कतिपय
धार्मिक एव सामाजिक प्रथाओ, आर्थिक एव राजनैतिक परिस्थिति
पर साथ ही श्वेताम्बरो एव दिगम्बरो के, तथा जैनो और अजैनों
के पारस्परिक सम्बन्धो पर भी अच्छा प्रकाश पड़ता है। इस ग्रन्थ
से ऐसा प्रतीत होता है कि उस काल मे ये सम्बंध अपेक्षाकृत
अधिक सौहार्द एव प्रीतिपूर्ण थे। दिगम्बर-श्वेताम्बर सम्प्रदाय का
भेद चिरकालीन एव रूढ हो चुका था, परन्तु अभी तक मन्दिर,
मूर्त्तियाँ एव तीर्थस्थान प्राय अभिन्न थे। उभय सम्प्रदायो के
श्रावक-श्राविकाएँ ही नही, साधु भी बहुधा साथ-साथ उनका
धर्मलाभ उठाते थे। यदि गुजरात, राजस्थान आदि के कतिपय
तीर्थों के प्रति श्वेताम्बरो का विशेष आकर्षण था तो महाराष्ट्र,
आन्ध्र, कर्णाटक आदि के तीर्थों पर दिगम्बरो का विशेष यातायात
था, किन्तु ऐसा कोई भेद उस समय तक उदय मे आया नही
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