विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ
पृष्ठ 40, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 40प्रस्तावना २१
प्रस्तावना २१
कोई उसके पुत्र या उत्तराधिकारी के साथ, तो कोई कन्नौज के
इन्द्रायुध प्रभृति किसी आयुधवंशी नरेश के साथ और कई एक
गुर्जर प्रतिहार नरेश नागभटद्वि० नागावलोक के साथ उक्त आम-
राज का समीकरण करते हैं। इस प्रसंग का विस्तृत विवेचन
स्वतंत्र लेख का विषय है। कल्प न० ५३ का आमरकुड आन्ध्र-
प्रदेश का प्रसिद्ध जैन तीर्थ रामकोड (रामगिरि) या रामतीर्थ
प्रतीत होता है१, और मुरगल नगर ककातीय नरेशो की सुप्रसिद्ध
राजधानी वारंगल। इस प्रसंग मे आचार्य ने ककातीय वंश की
उत्पत्ति और दिगम्बराचार्य मेघचन्द्र की सहायता से उक्त राज्य
वंश के प्रथम पुरुष माधवराज द्वारा राज्य की स्थापना की घटना
का उल्लेख किया है जो ऐतिहासिक दृष्टि से बडी महत्त्वपूर्ण है
दक्षिण भारत के गंग, सांतर, होयसल आदि कई अन्य राज्य-
वंशों की भाँति यह राज्य भी युगचेता जैन गुरुओ के प्रसाद से
अस्तित्व मे आया था। उसकी उत्पत्ति का विवरण जिनप्रभसूरि
ने स्वयं 'आमरकुंड' (रामकोण्ड) की एक गुहा के द्वार पर
उत्कीर्ण शिलालेख मे पढा था—घटना भी उनके समय से लगभग
दो-डेढ़ सौ वर्ष पूर्व की ही थी। उसे विश्वसनीय न मानने का
कोई कारण नही है। क्योकि इस घटना का उल्लेख अन्यत्र देखने
मे नही आया और शायद वह शिलालेख भी अब प्राप्त नही हैं,
विविध तीर्थ कल्प के इस विवरण का महत्त्व पर्याप्त बढ जाता है।
लगभग १००० ई० से लेकर आचार्य के जीवन काल पर्यन्त
समय से संबंधित जितने तथ्यो, घटनाओ, व्यक्तियो और तिथियो
का उल्लेख विविध तीर्थ-कल्प मे हुआ है, वे सब प्राय शुद्ध
१ देखिए हमारी पुस्तक 'दी जैन सोर्सेज आफ दी हिस्ट्री आफ
एन्शेन्ट इण्डिया' पृ० २०६, तथा ना रा प्रेमी—'जैन साहित्य और
इतिहास', पृ० ४४७.