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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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प्रस्तावना २३
एव निर्माण आदि कार्यों की सख्याएँ अतिशयोक्तिपूर्ण प्रतीत
होती हैं।
स्वय जिनप्रभसूरि से तथा उनके और दिल्ली के सुलतान
मुहम्मद बिन तुगलुक के सम्पर्क से सम्बन्धित तथ्य कल्यानयनीय
महावीरप्रतिमा-कल्प ( न० २२ ) मे प्राप्त होते है और ऐतिहासिक
दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। कल्यानयन ( कन्नान ? )¹ की उक्त
अतिशयपूर्ण महावीर-प्रतिमा की प्रतिष्ठा तथा तदनन्तर उसके
साथ घटी घटनाओ मे प्राय कोई अतिशयोक्ति प्रतीत नही होती ।
इस कल्प मे आचार्य ने स्वय जो कुछ वर्णन किया है उसे प्रामाणिक
एव विश्वसनीय स्वीकार करना चाहिए। कल्प के परिशेष
( न० ५१ ) मे विद्यातिलक ने तथा अन्य परवर्ती लेखको ने मूल
वर्णन को चमत्कारो आदि की निरन्तर वृद्धि द्वारा पल्लवित
किया और उत्तरोत्तर अतिशयोक्तियो से काम लिया प्रतीत होता
है, तथापि विद्यातिलक के ‘परिवेष’ मे कई तथ्य ऐसे है जो
आचार्य जिनप्रभ के अपने वर्णन के पूरक हैं।
इस्लाम धर्म का उदय सुदूर अरब की मरुभूमि में पैगम्बर
हजरत मोहम्मद द्वारा ७ वी शती ई० के प्रारभ मे हुआ, और
एक सौ वर्ष के भीतर ही वह धर्म प्राय पूरे मध्य एशिया पर छा
गया तथा पैगम्बर के उत्तराधिकारी खलीफाओ का राज्याधिकार
भारतवर्ष के सिन्ध प्रदेश तक विस्तृत हो गया। किन्तु भारत के
मध्यदेश पर सीधा आक्रमण करने वाला पहला मुसलमान गजनी
का अमीर महमूद था, जिसने ११वी शती ई० के प्रथम पाद मे
लगभग १७ आक्रमण करके एवं पश्चिमी भारत मे भयकर लूट

१ इस स्थान की पहचान श्री अगरचंद नाहटा ने पूर्वी पंजाब मे दादरी
के निकटस्थ ‘कन्नान’ से की है, जो अन्य सब विकल्पों की अपेक्षा
अधिक संगत प्रतीत होती है।