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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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२२ विविध तीर्थ-कल्प

ऐतिहासिक हैं, सत्यापित हैं अथवा सरलता से हो सकती हैं। वे
अधिकतर आचार्य की मातृभूमि गुजरात से सम्बद्ध हैं, तथा जो
अन्य प्रदेशो से भी सम्बद्ध हैं वे भी प्राय प्रमाणिक हैं, साथ ही
उनमे से अनेक पर्याप्त महत्त्वपूर्ण हैं—१०२४ ई० मे गजनीपति
(महमूद गजनवी) का गुजरात भंग करके साचौर पहुँचना;
१०३१ ई० मे आबू पर विश्वविश्रुत विमलवसती का निर्माण;
११२४ ई० मे, फलवर्द्धितीर्थ (न० ६०) के प्रसग मे राजगच्छी
शीलभद्रसूरि के पट्टधर धर्मघोषसूरि एव महावादी दिगम्बर
गुणचन्द्र का शास्त्रार्थ तथा १२वी शती ई० के अन्त के लगभग
शहाबुद्दीन गोरी द्वारा उक्त तीर्थ के भग किये जाने की घटना;
११२८ ई० मे रा खेंगार के पराभव के उपरान्त सज्जन मन्त्री
द्वारा गिरनार पर नेमि जिनालय का निर्माण और मालव के
भावडसाह द्वारा उसका स्वर्णकलश कराना, तथा ११६३ ई० में
कुमारपाल के दण्डनायक द्वारा उक्त पर्वत पर सीडियो का निर्माण
(न० ५); ११६० ई० मे आबू पर कुमारपाल द्वारा महावीर
चैत्यालय का और १२३१ मे वहाँ वस्तुपाल तथा तेजपाल द्वारा
लूणिगवसही का निर्माण तथा कालान्तर मे म्लेच्छो (मुसलमानो)
द्वारा आबू के दोनो प्रधान मदिरो की तोड-फोड (न० ८),
१२०९ ई० में देवाणदसूरि द्वारा पाटन की कोकावसति की
प्रतिष्ठापना और कालान्तर मे मालवा के सुलतान द्वारा चालुक्य
भीम द्वि० के समय में पाटन का भग किया जाना (न० ४०)
इत्यादि। वि० स० ८०२ मे अणहिलपुरपाटन की स्थापना और,
उस नगर से तदनन्तर क्रमश राज्य करने वाले चावडा, सोलकी
(चौलुक्य) एव बघेले राजाओ की राज्यावलि (न० २६)
इतिहाससिद्ध हैं, उसी प्रकार मन्त्रीश्वर वस्तुपाल एव तेजपाल
भ्रातृद्वय का यशस्वी चरित्र एवं कार्यकलापो का विवरण भी
(न० ४२) सिवाय इसके कि व्यय की गई विभिन्न द्रव्यराशियो