विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
इसी बीच परमार्थ ज्ञात कर उसके दोनो मामा दुर्विकल्प त्याग
कर पुन प्रतिष्ठान आ गए थे । उन्होने परचक्र देख कर बहिन से
कहा—बहिन । जिसने तुम्हे यह पुत्र दिया है उसे ही स्मरण करो,
ताकि वही इसका सहायक होगा ।
भ्राताओ के कथन से वह भी नागराज के वचनो को स्मरण
कर शिर पर घड़ा लेकर गोदावरी मे नागह्रद पर गई । नहा कर
नागराज की आराधना की । नागराज ने तत्काल प्रत्यक्ष होकर
कहा—ब्राह्मणी ! तुमने हमे किस लिए याद किया ? उसके प्रणाम
करके सारी बात बताने पर शेषराज ने मेरे प्रताप से तुम्हारे पुत्र
का कौन पराभव कर सकता है ?—कहते हुए उसका घड़ा लेकर
ह्रद के अन्दर गया और पीयूष कुण्ड से अमृत का घडा भर कर
उसे ला दिया । उसने कहा—इस अमृत से सातवाहन के बनाये
हुए मिट्टी के घोडे, रथ, हाथ व सैनिक अभिसिंचित करो जिससे
वे सजीव होकर शत्रु सेना को भग्न कर डालेगे । यह पीयूष-घट
ही तुम्हारे पुत्र को प्रतिष्ठानपत्तन के राज्याभिषिक्त करेगा !
अवसर पर मुझे याद करना । इसके वाद नागराज अपने स्थान
चला गया । वह भी अमृतघट को लेकर अपने घर आई और उस
मिट्टी की समृद्ध सेना को सीचा । प्रात काल देवशक्ति से वह सेना
सचेतन होकर शत्रु सेना के सामने जाकर उसके साथ युद्ध करने
लगी ।
सातवाहन की सेना ने मालवपति का बल भग्न कर दिया ।
राजा विक्रमादित्य भी भग कर अवन्ती चला गया । इसके पश्चात्
सानवाहन राज्याभिषिक्त हुआ । प्रतिष्ठानपुर ने अपनी पूर्व विभूति
पुन प्राप्त की । वहाँ हाट, हवेली, मन्दिर, राजमार्ग, खाई, प्राकार
आदि से सुशोभित सुन्दर पत्तन हो गया । सातवाहन ने भी क्रमश
दक्षिणापथ को तापी तट पर्यन्त अनृण करके उत्तरापथ को साध
प्रतिष्ठानपुराधिपति सातवाहन नृप-चारित्र १३५
कर अपना सवत्सर प्रवर्त्तित किया। वह जैन हुआ, उसने जन-
नयनशीतलकारी जिन-चैत्य बनवाये। पचास वीरो ने भी प्रत्येक
ने अपने अपने नामाङ्कित जिनालय नगर मे कराये।
प्रतिष्ठानपत्तन कल्प समाप्त हुआ, इसकी श्लोक सख्या ४७ है।
३४. प्रतिष्ठानपुराधिपति सातवाहन
नृप चरित्र
अब प्रसङ्गवश अन्य दर्शनियो के सिद्धातो मे लोकप्रसिद्ध
सातवाहन का शेष चरित्र भी कुछ कहते हैं। श्री सातवाहन जब
पृथ्वी का पालन कर रहे थे उस समय प्रतिष्ठाननगर मे पचास
वीर और बाहर भी पचास वीर निवास करते थे। इधर इसी नगर
मे एक ब्राह्मण का शूद्रक नामक अभिमानी पुत्र था, वह भी दर्प
पूर्वक युद्ध-श्रम करता रहता था जो पिता द्वारा अपने कुल के
लिये अनुचित बतलाकर निषेध करने पर भी नही मानता था।
एक दिन पिता के साथ जाते हुए बारह वर्षीय शूद्रक ने देखा
राजा सातवाहन नगर मे रहने वाले वापला, खूदला आदि पचास
वीरो के साथ व्यायाम करते हुए बावन हाथ प्रमाण वाली शिला
को उठा रहे थे। किसी वीर ने चार अगुल, किसी ने छ अगुल
और किसी ने आठ अंगुल भूमि से शिला को ऊँची उठाया। राजा
ने जानु तक ऊँचा उठा लिया। यह देखकर बल जागृत होने मे
१३६ विविध तीर्थ-कल्प
शूद्रक बोला—अहो ! क्या आप लोगो मे से कोई इस शिला को
मस्तक तक नही उठा सकता ? उन लोगो ने ईर्ष्यापूर्वक कहा—
यदि अपने को समर्थ मानते हो तो तुम्ही उठाओ। यह सुनकर
शूद्रक ने उस शिला को आकाश मे उछाला जो दूर तक ऊँची
चली गई। शूद्रक ने कहा—आप लोगो मे जो समर्थ हो वह इस
गिरती हुई शिला को रोक ले ! सातवाहनादि वीरो ने भयाक्रान्त
नेत्रो से उसी से अनुनयपूर्वक कहा—अहो महाबली ! हमारे प्राणो
की रक्षा करो ! रक्षा करो ! शूद्रक ने उस गिरती हुई शिला को
मुष्टिप्रहार किया जिससे उसके तीन टुकडे हो गए। उनमे एक
टुकडा तीन योजन पर जाकर गिरा, दूसरा टुकडा नागहृद मे
और तीसरा टुकडा प्रतोली द्वार के चौरस्ते पर जाकर गिरा जो
आज भी वैसे ही लोगो द्वारा देखा जाता है।
शूद्रक के बल से चमत्कृत होकर राजा ने उसे अत्यन्त सम्मान-
पूर्वक नगर का आरक्षक नियुक्त कर दिया। अन्य शस्त्रास्त्रो का
प्रतिषेध कर उस दण्ड धारण करने वाले का दण्ड हो आयुध बना।
वह शूद्रक भी वाहर रहने वाले वीरो को अनर्थ निवारण करने के
उद्देश्य से नगर मे प्रविष्ट नही होने देता था।
एक वार अपने महल के छत पर सोया हुआ राजा सातवाहन
शरीर-चिन्ता के लिए उठा। उसने नगर के वाह्य भाग मे करुण
रुदन सुना तो पराये दुख से दुखी हृदय से वह तलवार लेकर घर
से निकल पडा। रास्ते मे शूद्रक ने देखा और विनयपूर्वक नमस्कार
कर अर्द्धमहानिशा मे निकल पडने का कारण पूछा। राजा बोले—
यह नगर के समीप करुण क्रन्दन की ध्वनि सुनाई दे रही है इसका
कारण जानने के लिए मैं जा रहा हूँ। राजा के ऐसा कहने पर
शूद्रक ने निवेदन किया—देव ! आप प्रतीक्षा करते हुए भवन को
अलंकृत करने पधारिये, मैं ही उसकी खोज कर आऊँगा। ऐसा
कह कर राजा को लौटा दिया और स्वय गगन-ध्वनि के अनुसार
प्रतिष्ठानपुराधिपति सातवाहन नृप-चरित्र १३७
नगर के बाहर जाने लगा । आगे कान लगाकर चलते हुए उसने
सुना कि कोई गोदावरी के स्रोत मे रो रहा है । शूद्रक परि-
करबद्ध होकर तिरता हुआ ज्योही नदी के बीच मे पहुँचा, त्योही
प्रवाह मे बहते हुए और रोते हुए एक पुरुष को देखकर वह
बोला—अरे ! तुम कौन हो ? किस लिए रो रहे हो ? यह सुनकर
वह और भी ज़ोर-ज़ोर से रुदन करने लगा । अत्यन्त आग्रह से
पूछने पर वह स्पष्ट बोला—हे साहसिकशिरोमणि ! मुझे यहाँ से
निकाल कर राजा के समीप ले चलो, जिससे मै वहाँ अपना
वृत्तान्त कहूँ ।
उसके ऐसा कहने पर शूद्रक ने उसे उठाने का प्रयत्न किया
किन्तु वह उठ न सका । शूद्रक ने सोचा—कही नीचे से किसी
राक्षस ने न पकड-रखा हो । इस आशंका से उसने तलवार चलाई
तब मात्र शिर को वह ऊचा उठा पाया । हाथ मे आया हुआ शिर
छोटा सा था और उसमे से रुधिर झर रहा था । उसे देख कर
शूद्रक विषादपूर्ण होकर सोचने लगा—अहो ! प्रहार न करने वाले
पर भी प्रहार करने वाले मुझको धिक्कार है, मै शरणागत का
घातक हूँ । इस प्रकार आत्मनिन्दा करता हुआ वह वज्राहत के
समान क्षण भर के लिए मूर्छित हो गया । तत्पश्चात् चेतना आने
पर वह चिरकाल चिन्ता करने लगा कि मै अपनी इस दुश्चेष्टा को
को राजा से कैसे निवेदन करूंगा । इस प्रकार लज्जित मन से
वही काष्ठ की चिता बना कर उसमे अग्नि प्रज्वलित कर ज्यो ही
मस्तक को लेकर प्रवेश करने लगा, त्यो ही मस्तक ने कहा—हे
महापुरुष ! ये साहस आप क्यो कर रहे हैं। मैं तो राहु के समान
शिरमात्र ही हूँ ! अत वृथा खेद मत करो । और कृपा कर मुझे
राजा के पास ले चलो । उसकी यह बात सुन चमत्कृत चित्त मे—
यह प्राणी है—ऐसा मानता हुआ प्रसन्नता से शूद्रक उस शिर को
रेशमी कपडे मे लपेट कर प्रात काल सातवाहन राजा के पास
१३८ विविध तीर्थ-कल्प
पहुँचा । नमस्कार किया । राजा ने पूछा—शूद्रक ! यह क्या है ?
वह बोला—देव ! यह वही है जिसकी रुदन-ध्वनि श्रीमान् ने
रात्रि मे सुनी थी । फिर उसने उसका सारा वृतान्त निवेदन कर
दिया ।
राजा ने उस मस्तक से पूछा—अहो ! तुम कौन हो ? किस
लिए यहाँ आना हुआ ? मस्तक ने कहा—महाराज ! आपकी
कीर्ति दोनो कानो से सुन कर करुण रुदन के छल से अपने को
जतला कर मैं आपके पास आया हूँ । आपके दर्शन किए, आज मेरे
उभय नेत्र कृतार्थ हुए ! राजा ने पूछा—तुम कौनसी कला ठीक
ढंग से जानते हो ? उसने कहा—देव ! मैं संगीत कला जानता हूँ !
फिर राजा की आज्ञा से पहले नही गाया हुआ गीत गाने लगा !
उसकी गायन-कला से सारी राजसभा मोहित हो गई । वास्तव मे
वह मायासुर नाम का असुर था और वैसी माया बना कर राजा
की रानी, जो अत्यन्त रूपवती थी उसका हरण करने के लिए
आया हुआ था । पर यह किसी को पता नही लगा । लोगो ने तो
शिरमात्र देखने से उसका नाम प्राकृत—लोक भाषा मे सीपुला रख
दिया । तब से प्रतिदिन उस तुम्बुरु के द्वारा मधुरतर गाते रहने
पर उसका सारा स्वरूप महादेवी ने सुना और दासी के द्वारा
राजा को निवेदन कर उस शिर को अपने पास मगवाया ।
रानी प्रतिदिन उससे संगीत सुनने लगी ।
कुछ दिन बाद मायासुर ने अवसर पाकर रानी का अपहरण
कर लिया और अपने घण्टावलम्बी नामक विमान मे उसे चढा
लिया । रानी करुण क्रन्दन करने लगी—हाय, मेरा किसी ने अप-
हरण कर लिया, पृथ्वी पर क्या कोई ऐसा वीर है जो मुझे छुडा
ले ! खुहला वीर ने रानी की यह पुकार सुन कर दौडते हुए
आकाश मे उछल कर उस विमान का घटा अपने हाथ से दृढता
प्रतिष्ठानपुराधिपति सातवाहन नृप-चरित्र १३९
पूर्वक पकड़ लिया । उसके साहस से विमान स्तब्ध हो गया और
आगे नही चला । मायासुर ने सोचा—यह विमान आगे क्यो नही
चल रहा है । फिर ज्यो ही हाथ मे घट को पकडे उस वीर को
देखा, तो उसका हाथ काट डाला । वीर पृथ्वी पर गिर पड़ा और
विमान को असुर आगे ले चला ।
देवी के अपहरण-वृत्तान्त को राजा ने सुना और ४९ वीरो
को आदेश दिया कि यह देवी का किसने अपहरण किया है, खोज
करिए । वे लोग पहिले से ही शूद्रक से असूया रखते थे अत-
मौका पाकर बोले—महाराज ! शूद्रक ही जाने, वही उस
शिर को लाया था जिसने देवी का अपहरण कर लिया । राजा ने
शूद्रक पर कुपित होकर उसे शूली पर चढाने की आज्ञा दी ।
तत्कालीन देशरीति के अनुसार शूद्रक पर रक्त चन्दन का
लेप किया गया और उसे शकट मे सुलाकर गाढा बाँध कर शूली
पर चढाने के लिए ज्यो ही राजपुरुष चले त्यो ही ४९ वीर एकत्र
होकर शूद्रक से कहने लगे—हे महावीर ! आप रण्डा के समान
किस लिए मर रहे हो ? “अशुभस्य कालहरणम्” न्याय से राजा
से कुछ दिन की अवधि माँगो और देवी का अपहरण करने वाले
की सर्वत्र खोज करो । निष्कारण ही क्यो अपने वीरत्व की कीर्त्ति
को नष्ट कर रहे हो ! उसने कहा—तब राजा के पास जाकर यह
बात निवेदन करिए ! उन्होने वैसा ही किया । राजा ने शूद्रक को
वापस बुलाया । उसने भी अपने मुख से निवेदन किया—महाराज
अवधि दीजिए, जिससे मैं प्रत्येक दिशा मे देवी का अपहरण करने
वाले की खोज करूँ । राजा ने उसे दस दिन की अवधि दी ।
शूद्रक के घर उसके दो सहचारी कुत्ते थे । राजा ने कहा—तुम
दोनो कुत्तो को जमानत स्वरूप हमारे पास रख दो और स्वय देवी
के अनुसंधानार्थ पृथ्वी पर भ्रमण करो । वह वीर भी आदेश प्रमाण
है । कह कर रवाना हो गया ।
१४० विविध तीर्थ-कल्प
राजा ने साकल से बँधे हुए उन दोनो कुत्तो को अपनी शय्या
के पायो से बाँध दिया। गूद्रक को चारो ओर पर्यटन करते हुए भी
कही उसे देवी की वार्ता तक नही मिली तो उसने सोचा—"मेग
यह अपयश प्रगट हुआ है, मैं स्वामी-द्रोही गिना जाऊँगा और
लोग कहेगे कि देवी का इसी ने अपहरण करवा दिया। जब कही
भी उसका पता नही लग रहा है तो मुझे अब मरण का ही शरण
हो।" इस विचार से उसने काष्ठ को चिता बनाई और उसमे
अग्नि प्रज्वलित कर ज्यो ही प्रवेश करने लगा त्यो ही देवाधिष्ठित
कुत्तो ने जाना कि हमारा स्वामी निधन को प्राप्त हो रहा है। वे
दोनो दैव-शक्ति से साकले तोडकर अविलम्ब वहाँ जा पहुँचे जहाँ
गूद्रक ने चिता बनाई थी। उन्होने दाँतो से केशो को पकड कर
गूद्रक को चिता से बाहर निकाल लिया। उसने भी अकस्मात् उन
कुत्तो को देखकर विस्मित मन से कहा—अरे पापियो ! अशुभ के
समान आपने यह क्या किया ? राजा के मन का विश्वास नष्ट
हो जायगा और जानेगा कि जामिनो को भी वह अपने साथ ले
गया। दोनो कुत्ते बोले—धैर्य रखिये और हमारी दिखायी हुई
दिशा मे चलिये। जल्दो मत करिये। ऐसा कह कर वे आगे हो
गए। वह भी उनके साथ चला और क्रमश कोल्लागपुर पहुँचे।
वहाँ के महालक्ष्मी देवी के मन्दिर मे प्रवेश किया गूद्रक ने देवी
को पूजा कर कुगासन अर दैठे हुए तीन उपवास किए। भगवती
महालक्ष्मी प्रत्यक्ष होकर बोली—वत्स ! क्या खोज रहे हो। गूद्रक
ने कहा—भगवती ! सातवाहन राजा की महिषी का पता बतला-
डये, वह कहाँ है। किसने अपहरण किया है। श्री देवी ने कहा—
सब यक्ष-राक्षस-भूत आदि देव गणो को एकत्र कर यह बात मैं
तुम्हे बतलाऊँगी। किन्तु उन सब के लिए तुम्हे वलि-उपहार आदि
एकत्र कर रखना चाहिए। जब तक वे वलि-पूजा ग्रहण कर प्रसन्न
न बने तब तक तुम विघ्नो की रक्षा करते रहना।
प्रतिष्ठानपुराधिपति सातवाहननृप-चरित्र १४१
शूद्रक ने उन देवताओ का तर्पण करने के लिए कुण्ड बना कर
हवन करना प्रारभ-किया । सब देवता गण आये और अभिमुख
हो अपना-अपना भाग ग्रहण किया। ज्यो ही होम का धुँआ फैला,
जहाँ मायासुर था उसने भी लक्ष्मी के आदेग से शूद्रक द्वारा किये
गए होम का स्वरूप जाना और अपने भाई कोल्लासुर को होम मे
विघ्न करने के लिए भेजा। कोल्लासुर अपनी सना सहित आकाश
मे आ गया, सभी देवताओ ने आश्चर्यपूर्वक उसे देखा। वे दोनो
कुत्ते दिव्य गक्ति से उन दैत्यो के साथ युद्ध करने लगे दैत्यो ने
उन्हे मार दिया तब शूद्रक स्वय युद्ध करने लगा। उसके पास दण्ड
के अतिरिक्त दूसरा गस्त्र न होने पर भी मात्र दण्ड से ही उसने
बहुत से असुरो को मार डाला। दैत्यो ने उसकी दक्षिण भुजा काट
डाली तो वह वाम भुजा से ही दण्ड-युद्ध करने लगा। वाम भुजा
के कट जाने से दक्षिण पाँव मे दण्ड धारण कर वह युद्ध करने
लगा। दैत्यो द्वारा उसे भी काट दिए जाने पर बाँये पाँव से दण्ड
युद्ध किया तो असुरो ने उसे भी काट डाला। शूद्रक अपने दाँतो
मे दण्ड पकड कर जब युद्ध करने लगा तो दैत्यो ने उसका मस्तक
भी काट दिया।
अब आकण्ठ तृस देव गणो ने शूद्रक का मस्तक भूमि पर पडा
देख कर कहा—अहो ! अद्भुत भोग देने वाले इस विचारे का यह
क्या हुआ ? इस प्रकार सन्ताप करते हुए वे भी लडने लगे और
कोल्लासुर को मार गिराया। श्री देवी ने अमृत-सिंचन कर शूद्रक
को पूर्णाङ्ग बना दिया और जीवित कर दिया। देवी ने दोनो कुत्तो
को भी जीवित कर प्रसन्नतापूर्वक उसे खङ्गरत्न दिया और
कहा—इससे अजय रहोगे। ऐसा वर दिया।
इसके बाद शूद्रक महालक्ष्मी आदि देवताओ के साथ राजा
नातवाहन की रानी को खोजने के लिए सारे भूमण्डल मे घूमता
हुआ महार्णव मे पहुँचा। वहाँ एक ऊँचा वटवृक्ष देखकर विश्राम
१४२ विविध तीर्थ-कल्प
के लिए उस पर चढ गया। वहाँ उसने पेड की शाखा पर लटकते
हुए नीचा शिर किए हुए काष्ठ की कील मे ऊँचे पाँव रहे हुए
पुरुष को देखा। वह जिह्वा फैलाकर पानी मे रहे हुए जलचर
जीवो को भक्षण कर रहा था, यह उन सभी ने देखा। गूद्रक ने
उससे पूछा—तुम कौन हो ? इस प्रकार क्यो लटक रहे हो ? उसने
कहा—मैं मायामुर का छोटा भाई हूँ। मेरा वडा भाई कामोन्मादी
है, उसने रावण की भाँति सीता जैसी सातवाहन की महिषी को
रमण करने की इच्छा मे हरण कर लिया है। वह पतिव्रता है,
उसे विल्कुल नही चाहती। मैने भाई से कहा—आपको परदारा
का अपहरण करना योग्य नही है क्योकि अपने विक्रम से सारे
ससार को आक्रान्त करने वाला रावण भी परस्त्रीरमण की
इच्छा से कुलक्षय को प्राप्त हुआ था। मेरे इस प्रकार कहने पर
मायामुर क्रुद्ध हो गया और मुझे इस वट की शाखा मे टगाकर
इस प्रकार विडम्बित किया है। मैं जिह्वा फैला कर समुद्र मे चलने
वाले जलचरादि का भक्षण कर जीवन धारण कर रहा हूँ। यह
सुन कर शूद्रक ने कहा—मैं भी उन्ही राजा सातवाहन का गूद्रक
नामक सेवक हू। और उसी देवी की शोध के लिए आया हू। उस
असुर ने कहा—यदि ऐसा है तो मुझे छुडाओ। जिससे मैं तुम्हारे
साथ चल कर उस देवी को दिखाऊँ। मायामुर ने अपने स्थान के
चारो ओर लाक्षा का दुर्ग बना रखा है वह निरन्तर प्रज्वलित
रहता है अत उसे उल्लघन कर अन्दर जाकर उसे मार कर देवी
को लौटाना है।
यह सुनकर शूद्रक ने उसके काष्ठ-बन्धन काट डाले और
उसके पीछे-पीछे देवताओ से घिरे हुए प्रस्थान कर दुर्गोल्लघन
पूर्वक उस स्थान मे जा पहुँचा। मायामुर देवगणो को देख कर
अपनी सेना को साथ लेकर उनसे युद्ध करने लगा। सेना के मर
जाने से वह स्वयं मैदान मे उतर पडा, गूद्रक ने क्रमश उस
प्रतिष्ठानपुराधिपति सातवाहननृप-चरित्र १४३
तलवार के द्वारा मायासुर को मार डाला । और उस घटावलवी
विमान मे देवी को चढा कर सब देवगण शीघ्र ही प्रतिष्ठानपुर की
ओर प्रस्थान कर गए ।
इधर दग दिन की अवधि पूर्ण होते जानकर राजा विचारने
लगा—न तो मेरी महादेवी आई और न गूद्रक वीर और न वे दोनो
कुत्ते ही वापस लौटे । यह सब विनागलीला मुझ कुबुद्धि ने ही
करवायी । इस प्रकार चिन्ता करते हुए सपरिवार प्राणत्याग की
इच्छा से नगर के वाहर उसने चन्दनादिकाष्ठ से चिता तैयार कर-
वायी । ज्योही वह परिजनसमूह को चिता मे डालने लगा त्योही
देवगणो मे से एक वधाई देने वाला वहाँ आ पहुचा और विनय-
पूर्वक राजा से निवेदन किया—देव ! महादेवी के आगमन से
भाग्यशाली हैं ! देव की इस कर्णमनोहर वात को सुन आनद कद
कलित चित्त से राजा ने ज्यो ही ऊँचा देखा—आकाग मे देव-
समूह और गूद्रक दिखलाई पडे । गूद्रक और महादेवी विमान से
उतर कर राजा के चरणो मे गिर पडे । गातवाहन राजा ने
आनन्दसहित गूद्रक का अभिनन्दन करते हुए उसे अर्द्ध राज्य
दिया । राजा, महादेवी के साथ गूद्रक का चारु चरित सुनता
हुआ उत्सवपूर्वक नगर मे प्रविष्ट हो राज्य-लक्ष्मी भोगने लगा ।
इस प्रकार हाल राजा के भाँति-भाँति के अवदान हैं, कितनो
का वर्णन किया जा सकता है ? इसी ने गोदावरी नदी के किनारे
महालक्ष्मी को स्थापित किया और प्रासाद मे उन उन स्थानो मे
अन्यान्य देवता भी यथायोग्य स्थापित किये । इस प्रकार राजा
चिरकाल तक विगाल राज्य का उपभोग करता रहा ।
नगर की वणिक-वीथी मे कोई काष्ठभारवाहक प्रतिदिन
अच्छी लकडियाँ लाकर बेचा करता था । किसी दिन वह भार
बेचने नही आया । वणिक ने उसकी वहिन से पूछा-आज तुम्हारा
१४४ विविध तीर्थ-कल्प
भाई गली मे क्यो नही आया ? उसने कहा--श्रेष्ठिवर ! मेरा भाई
देवताओ मे रहता है। वणिक ने कहा—यह कैसे ? वह बोली—
ककण बँधने से लेकर विवाह-प्रकरण तक चार दिन मनुष्य अपने
आपको देवताओ के बीच वसता हुआ मानता है, वैसे वैसे उत्सव
देखने के कुतुहल से वैसा अनुभव करता है। यह वात राजा तक
पहुँची, राजा ने विचार किया—अहो ! क्या मै देवताओ मे नही
रहता ? मैं भी चार दिनो के अनवरत विवाहोत्सवमय देवस्वरूप
रहूगा । यह सोचकर चार वर्णो मे जिन-जिन कन्याओ को युवती
या रूपवती देखता सुनता, उन्ही को उत्सवपूर्वक विवाह लाता
था।
इस प्रकार बहुत सा समय बीत जाने पर लोगो ने विचार
किया—क्या भविष्य मे सभी वर्ण वाले लोग नि सन्तान ही रहेगे ?
सब कन्याओ के साथ तो राजा ही विवाह कर लेता है। स्त्री के
विना सन्तान कहाँ से होगी ? इस प्रकार लोगो के दुखी होने पर
‘विवाह वाटिका' नामक गाँव मे रहने वाले एक ब्राह्मण ने पीठजा
देवी का आराधना करके निवेदन किया-- भगवती ! हमारे सतानो
का विवाह कैसे होगा ? देवी ने कहा—ब्राह्मण ! मैं तुम्हारे घर मे
कन्या के रूप मे अवतार लूगी। जब मेरे लिए राजा प्रार्थना करे
तो मुझे राजा को दे देना, शेष मैं सब संभाल लूंगी ! वैसा ही
हुआ । राजा ने उसे रूपवती सुनकर विप्र से याचना की। वह भी
बोला—मैंने कन्या दी, किन्तु महाराज वही पधार कर मेरी कन्या
के साथ विवाह करे ! राजा ने स्वीकार कर लिया। ज्योतिषी के
दिए हुए लग्न मे राजा विवाह करने के लिए चला और उस गाँव
श्वसुर के घर पहुँचा। देशाचार के कारण वर और वधू के बीच
मे पडदा डाल दिया गया। अजलि मे खील (लाजा, जँवार की
फूली) भर कर ज्यो ही दोनो पडदा हटा कर एक दूसरे के
प्रतिष्ठानपुराधिपति सातवाहननृप-चरित्र १४५
गिर पर लाजा विखेरने लगे। फिर हथलेवा होने वाला ही था,
राजा ने उसकी ओर देखा त्यो ही वह भयङ्कर रूप वाली राक्षसी
सी दिखाई पडी। और वह लाजा (जंवार 'की फूली) खीले भी
कठोर पाषाण के कंकड के समान शिर मे लगने लगी। राजा ने
भी—यह क्या आफत है—विचार करते हुए वहाँ से पलायन कर
दिया। वह भी पीछे लगी हुई पत्थर के टुकडे बरसाती हुई चलने
लगी। राजा वहाँ से दौडता हुआ अपनी जन्म-भूमि नाग-ह्रद मे
प्रविष्ट हुआ और वही पर मर गया। आज भो वह पीठजा देवी
प्रतोली के वाहर अपने मन्दिर मे स्थित है।
शूद्रक भी क्रमग कालिका देवो द्वारा अजारूप वन कर वापी
मे प्रविष्ट हो करुण गब्द से ठगा गया। वह उसे निकालने के
लिए वापो मे गया और द्वार पर उस तलवार के तिरछी गिर
जाने से छिन्नाङ्ग होकर पञ्चत्व प्राप्त हो गया, क्योकि महालक्ष्मी
ने वर देते समय “इसी तलवार से तुम्हारा अन्त होगा” कह
दिया था।
राजा सातवाहन के स्थान पर गक्तिकुमार का राज्याभिषेक
हुआ, तव-से लेकर आज तक कोई राजा प्रतिष्ठान—वीर क्षेत्र मे
प्रवेग नही करता।
यहाँ जो कुछ असंभव बातें हैं वे अन्य दर्शन मे कही गई है।
इस प्रकार की असंगत बातें जो हेतु से सिद्ध नही होती, उन्हे जैन
नही मानते।
यह प्रतिष्ठान-कल्प और प्रसगवश संक्षिप्त सातवाहन-चरित्र
श्रीजिनप्रभसूरि ने वनाया। इसकी ग्रन्थ सख्या १६६ और ९
अक्षर ऊपर है।
१०
३५. चम्पापुरी-कल्प
दुर्नीति को भग करने वाले अंग देग जनपद के भूषणरुप
प्रधान तीर्थ चम्पापुरी का कल्प कहता हूँ । यहाँ त्रिभुवन-पूज्य
बारहवे तीर्थङ्कर श्री वासुपूज्य जिनेश्वर के गर्भावतरण-च्यवन,
जन्म, प्रव्रज्या, केवलज्ञान और निर्वाण रुप पाँच कल्याणक
हुए हैं ।
यही श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र के पुत्र मघव राजा की पुत्री लक्ष्मी
की कुक्षी से आठ पुत्रो के ऊपर रोहिणी नामक पुत्री उत्पन्न हुई ।
उसने स्वयवर मे अशोक राजा के कण्ठ मे वरमाला डाली और
उसके साथ विवाह कर पट्टरानी हुई । क्रमशः उसके आठ पुत्र और
चार पुत्रियाँ हुई । एक दिन श्री वासुपूज्य स्वामी के शिष्य रूप्य-
कुम्भ-स्वर्णकुम्भ के मुख से सुखी होने के हेतु भूतपूर्व जन्म मे किये
हुए रोहिणी तप को सुन कर उद्यापन विधि से आराधना कर
सपरिवार मुक्ति प्रप्त हुई ।
यहाँ भूमण्डल के इन्द्र सहश करकण्डू राजा ने पहिले काद-
म्बरी अटवी मे कलिगिरि की उपत्यका मे रहे हुए कुण्ड नामक
सरोवर मे श्री पार्श्वनाथ भगवान को छद्मस्थावस्था मे विचरते
हुए हस्ति-व्यन्तरानुभाव से कलिकुण्ड तीर्थ रूप से प्रतिष्ठापित
किया था ।
फिर यहाँ सुभद्रा महासती ने तीन विकट पाषाणमय प्रतो-
लियो के वन्द कपाट-सम्पुटो को अपने शील माहात्म्य द्वारा कच्चे
सूत-तन्तु-वेष्टित चलनी से कुएँ का जल निकाल कर उससे
सिंचित कर उद्घाटित किये थे । चारो मे से एक प्रतोली—"मेरे
जैसी अन्य सच्चरित्रा सती हो, उसके उघाडने के लिए वन्द ही
चम्पापुरी-कल्प १४७
छोड देती हूँ"—कह कर राजा आदि लोगो के समक्ष बन्द ही
रहने दी। उस दिन से ले कर चिरकाल पर्यन्त जनता ने उसे
वैसो ही बन्द देखी। क्रमश विक्रम संवत् १३६० मे लक्षणावती
के सुलतान समसदीन ने शकरपुर दुर्ग के उपयोगी पाषाण लेने के
लिए उस प्रतोली को गिरा कर कपाट जोडी को भी ले लिया।
यहाँ के दधिवाहन राजा अपनी रानी पद्मावती के साथ उसका
दोहद पूर्ण करने के लिए हाथी पर आरूढ हो कर अरण्य-विहार
करने गये। हाथी के न रुकने पर अरण्य मे राजा वृक्ष की शाखा
पकड कर उतर गया। हाथी आगे चला गया और राजा अपने
नगर मे आ गया। देवी पद्मावती असमर्थता से उतर न सकी
और उस पर चढी हुई अरण्य मे गई। हथिनी से उतर कर क्रमश
अरण्य मे ही पुत्र-प्रसव किया, वह करकण्डु नामक राजा हुआ।
कलिंग मे पिता के साथ युद्ध करते माता पद्मावती आर्या ने उसे
प्रतिषेध किया। क्रमशः महावृषभ की यौवन, वार्धक्य अवस्था
को देख कर बोधि पा कर करकण्डु प्रत्येकबुद्ध हो कर सिद्धिगति
प्राप्त हुए।
यही दधिवाहन राजा की पुत्री चन्दनबाला ने जन्म लिया,
जिसने भगवान महावीर स्वामी को कौशाम्बी मे सूप के कोने मे
रहे हुए उडद के वाकुले दे कर पाँच दिन कम छ मासोपवास का
पारणा द्रव्य क्षेत्र कालभाव अभिग्रह पूर्ण होने पर कराया।
यहाँ एवं पृष्ठचम्पा मे प्रभु महावीर ने तीन वर्षाकाल विताए,
समवशरण हुए।
इसी के पास श्री श्रेणिक राजा के पुत्र अशोकचन्द्र अपर नाम
कूणिक महाराजा ने पितृशोकवश राजगृह को त्याग कर चम्पक
के चारु पुष्पोसे सुन्दर नवीन राजधानी चम्पा बसाई।
दानवीरो मे दृष्टान्तभूत, पाण्डुकुलमण्डन राजा श्री कर्ण का
१४८ विविध तीर्थ-कल्प
राज्य भी यही था। आज भी शृंगार-चतुरिका आदि उनके
अवदात स्थान इस नगरी मे हैं।
यहाँ सम्यग्दृष्टि सुदर्शन सेठ को दधिवाहन राजा की रानी
अभया ने संभोगार्थ उपसर्ग किये। राजा के वचनो से मारने के
लिए ले जाने पर अपने निर्दोष शील-सम्पत्ति के प्रभाव से आकृष्ट
शासनदेवता के सानिध्य से शूली का स्वर्णमय सिंहासन हो
गया। और तीक्ष्ण तलवार भी सुगन्धित पुष्पमाला हो कर मन
को आनन्ददायी बन गई।
भगवान महावीर का अग्रश्रावक कामदेव भी यही हुआ जो
अठारह करोड स्वर्ण एव दश हजार गायो वाले छह गोकुलो का
स्वामी था। भद्रा का वह पति था। पौषधशाला मे मिथ्यादृष्टि
देव द्वारा पिशाच, हाथी, साँप आदि का रूप करके उपसर्ग करने
पर भी अक्षुब्ध रहा। समवशरण मे भगवान ने स्वय इनकी
प्रशसा की।
यही विचरते हुए चौदह पूर्वधर श्री शय्यंभवसूरि ने राजगृह
से आये हुए अपने मनक नामक पुत्र को दीक्षित करके श्रुतोपयोग
से उसकी छ मास आयु अवशिष्ट ज्ञात कर उसके अध्ययनार्थ
पूर्वो से दशवैकालिक सूत्र की रचना की। उनमे आत्म-प्रवाद से
छज्जीवणिया, कर्म-प्रवाद पूर्व से पिण्डैषणा, सत्य-प्रवाद पूर्व से
वाक्यशुद्धि एव अवशिष्ट अध्ययन प्रत्याख्यान पूर्व की तीसरी
वस्तु से लिए।
यहाँ के निवासी कुमारनन्दी स्वर्णकार ने अपने विभव वैभव
के मद से अभिभूत हो तीव्र ज्वाला मे प्रविष्ट हो पचशैलाधिपत्य
प्राप्त किया। पूर्व भव के मित्र से बोध पा कर गोशीर्षचन्दन-
मय जीवित स्वामी की अलकारविभूषित देवाधिदेव श्री महावीर
स्वामी की प्रतिमा निर्मित की।
चम्पापुरी-कल्प १४९
यहाँ के पूर्ण भद्र चैत्य मे श्री वीर प्रभु ने कहा—जो अष्टापद
पर आरोहण करता है वह उसी भव मे मोक्षगामी है।
यहाँ श्री वीर प्रभु का उपासक पालित नामक वणिक हुआ।
उसके समुद्र यात्रा मे जन्मा हुआ समुद्रपाल नामक पुत्र था जिसने
किसी अपराधी को मारने के लिए ले जाते देख कर प्रतिबोधित
मोक्ष प्राप्त किया।
यहाँ के सुनन्द श्रावक ने साधुओ के मल-दुर्गन्ध की निन्दा
की और मर कर कौशाम्बी मे श्रेष्ठि पुत्र हुआ, व्रत ग्रहण किया।
दुर्गन्ध उदीरण होने पर कायोत्सर्ग ध्यान द्वारा देवता को आकृष्ट
कर अपने अग को सुगन्वित कराया।
यहाँ कौणिकार्य शिष्य अगर्षि रुद्रक ने अभ्याख्यान सविधान
के और सुजात प्रियगु आदि कई सविधानो को बनाया।
इत्यादि नाना प्रकार के संविधानक रत्न प्रकटित नाना वृत्त-
निधान-घटनाओ वाली यह नगरी है। इस नगरी की प्राकार-
भित्ति को प्रिय सखी की भाँति प्रतिक्षण सर्वाङ्ग आलिङ्गन करती
पवित्र घन रसपूरितान्तर वाली उत्तम नदी है।
उत्तमोत्तम नर-नारी रूपी मुक्तामणि को प्रसव करने मे शुक्ति
के सदृश यह नगरी विविध अद्भुत वस्तु शालिनी मालिनी
जयवन्त है।
भगवान् वासुपूज्य स्वामी की जन्मभूमि को विद्वान लोग
उनकी भक्तिपुरस्सर स्तवना करते हैं। श्री जिनप्रभ सूरि ने चम्पा
नगरी का यह कल्प कहा।
श्री चम्पापुरी का कल्प समाप्त हुआ। इसकी ग्रन्थ-श्लोक
सख्या ४७ है।
३६. पाटलिपुत्रनगर-कल्प
श्री नेमिनाथ भगवान को नमस्कार करके अनेक पुरुष-रत्नो
के जन्म से पवित्रित पाटलिपुत्र नामक नगर का कल्प प्रस्तुत
करता हूँ ।
पूर्वकाल मे महाराजा श्रेणिक का निधन होने पर उसके पुत्र
कूणिक ने पितृगोक से चम्पापुरी नई वसाई । उसकी मृत्यु के
पश्चात् उसका पुत्र उदयि चम्पा की राजगद्दी पर बैठा । वह भी
अपने पिता के क्रीडास्थान-राजसभा-शयनागार-भोजनालय आदि
स्थानो को देखकर अत्यन्त गोकाकुल हो जाता था । तब अमात्य
लोगो की अनुमति से नया नगर बसाने के लिए नैमित्तिक लोगो
को स्थान-गवेषणार्थ आदेश दिया । वे सर्वत्र उन स्थानो को देखते
हुए गगा-तट पर गये । वहाँ पाडल कुसुम वाले पाटलि वृक्ष को
देखकर उसकी गोभा से चमत्कृत हुए । उसकी गाखा पर बैठे हुए
चाषपक्षी के मुँह मे कीटकादि जन्तु स्वयमेव आकर गिरते देखकर
सोचा—अहो ! इस चाप पक्षी के मुँह मे स्वयं कीडे आकर गिर
रहे हैं तो इस स्थान पर नगर बसाने से राजा को स्वयं लक्ष्मी
प्राप्त होगी । उन्होने राजा से विज्ञप्ति की । वह भी अत्यन्त प्रसन्न
हुआ । वहाँ एक वृद्ध नैमित्तिक ने कहा—देव ! यह पाडल वृक्ष
साधारण नही है । पूर्वकाल मे ज्ञानियो ने कहा है कि—
“महामुनि की खोपडी मे उत्पन्न यह पवित्र पाटल वृक्ष है,
विगेश इसका मूल जीव एकावतारी है ।”
राजा ने कहा—वे महामुनि कौन ? नैमित्तिक ने कहा—देव !
सुनिये । उत्तर मथुरा मे रहने वाला देवदत्त नामक वणिक पुत्र
एक वार पर्यटन करने के लिए दक्षिण मथुरा गया । वहाँ जयसिंह
पाटलिपुत्रनगर-कल्प १५१
नामक वणिक पुत्र के साथ उसकी मित्रता हो गई। वह एक वार
उसके घर भोजन करने गया तो थाल मे भोजन परोस कर पखा
झलकर हवा करती हुई उसकी अन्निका नामक बहिन के सौन्दर्य
को देखकर उसमे अनुरक्त हो गया और दूसरे दिन चरो को भेज-
कर जयसिंह से अन्निका की याचना की। उसने कहा—मैं अपनी
बहिन को उसे दूँगा जो मेरे घर से दूर न हो और जब तक उसके
सन्तान जन्मे में उन्हे प्रतिदिन देख सकूँ। इस लिए तब तक यदि
वह मेरे घर रहे तो मै उसे अपनी वहिन दूँगा। देवदत्त के स्वीकार
करने पर शुभ मुहूर्त्त मे उनका विवाह कर दिया।
देवदत्त उसके साथ भोग भोगते हुए वहाँ रहने लगा। एक
दिन उसके पास अपने माता-पिता का पत्र आया, जिसे पढकर
उसके नेत्रो मे अश्रु-वर्षा होने लगी। कारण पूछने पर भी न बोला
तो अन्निका ने स्वयं पत्र लेकर पढा। उसमे माता पिता ने लिखा
था—बेटा ! हम दोनो वृद्ध हो गए, मृत्यु निकट है, यदि हमे जीते
देखना चाहते हो तो शीघ्र आ जाना। उसने पति को आश्वासन
देकर अपने भाई को हठ छोडने की प्रार्थना की। और पति के
साथ उत्तर मथुरा को जाते उस सगर्भा ने पुत्र जन्म दिया। देवदत्त
के “इसका नामकरण पिताजी करेंगे” ऐसा कहने पर परिजन
लोग उस बालक को 'अन्निका पुत्र' नाम से पुकारने लगे। क्रमश·
देवदत्त अपने घर पहुँचा। माता पिता को नमस्कार कर उसने
उन्हे पुत्र को अर्पण किया। उसका नाम सधीरण रखा तो भी
अन्निकापुत्र नाम ही प्रसिद्ध हुआ।
अन्निकापुत्र ने बडे होकर तरुणावस्था मे भोगो को तृणवत्
छोडकर जयसिंहाचार्य के पास दीक्षा ग्रहण कर ली और गीतार्थ
होकर आचार्य पद प्राप्त किया।
एक वार वृद्धावस्था मे विचरते हुए अन्निकापुत्राचार्य पुष्प-
भद्रपुर पहुंचे। वहाँ पुष्पकेतु राजा और पुष्पवती रानी के पुष्प-
१५२ विविध तीर्थ-कल्प
चूल, पुष्पचूला नामक पुत्र-पुत्री युगल थे । वे दोनो साथ-साथ
वढते-खेलते परस्पर अत्यन्त प्रीति वाले हो गए । राजा ने देखा
इन दोनो का वियोग कराने से निश्चय ही ये जीवित नही रहेगे ।
और मै भी इनका विरह नही सहूँगा, अत इनका परस्पर विवाह
कर दूँ तो अच्छा हो, यह विचार कर मन्त्री-मित्र और नागरिको
से उसने छलपूर्वक पूछा—यदि अन्त पुरमे रत्न उत्पन्न हो तो
उसका स्वामी कौन ? उन लोगो ने कहा—
देव ! अन्त पुर का तो कहना ही -या ? जिस देश मे रत्न
उत्पन्न हो उसे राजा स्वेच्छानुसार विनियुक्त करे, इसमे किसी को
क्या आपत्ति है।
यह सुनकर राजा ने अपना अभिप्राय कहा । महागनी के मना
करने पर भी राजा ने उनका सबध घटित कर दिया । दोनो पति-
पत्नी सासारिक भोग करने लगे । रानी ने पति के अपमान से
विरक्त होकर व्रत ग्रहण किया और स्वर्ग मे देव हो गई ।
राजा पुष्पकेतु का जीवन अध्याय शेष होने पर पुष्पचूल राजा
हुआ । देव ने अवधिज्ञान प्रयोग से उसका अकृत्य जान कर पुष्प-
चूला को स्वप्न मे नरक और वहां के दुख दिखलाये । उससे
प्रबुद्ध होकर भय से पति को सारा निवेदन किया, उसने शांति के
उपाय किये । वह देव प्रति रात्रि मे उसे नरक दिखाता था ।
राजा ने समस्त तीर्थिक लोगो को बुलाकर पूछा—नरक कैसे होते
हैं ? किसी ने गर्भावास को, किसी ने कारावास को, किसी ने
दारिद्रय को और किसी ने परतन्त्रता को नरक बतलाया । रानी
उनके विसवादी वचनो को सुनकर मुख मोडकर बैठ गई ।
राजा ने अग्निकापुत्र आचार्य को बुलाकर उन्हे पूछा ।
उन्होने जैसा रानी ने देखा था, वैसा ही नरक स्वरूप बतलाया ।
रानी ने कहा—भगवन् ! आपने भी क्या स्वप्न देखा है, अन्यथा
यह कैसे जानते हैं ? सूरि महाराज ने कहा—भद्रे ! जिनागमो से
सब कुछ मालूम होता है । पुष्पचूला ने कहा—भगवन् ! किस कर्म
से नरक प्राप्त होते हैं ? गुरु महाराज ने कहा—भद्रे ! महा
आरंभ-परिग्रह और गुरुविरोधी होकर पञ्चेन्द्रियवध—मासाहार
से प्राणियोका नरक पतन होता है ।
क्रमश देव ने उसे स्वप्न मे स्वर्ग दिखाये । राजा ने उसी
प्रकार पाखण्डियो से पूछा और उनके परस्पर-विरोधी विरोधी
वचन पाकर उन्हे विसर्जित कर आचार्य महाराज से स्वर्ग का
स्वरूप पूछा । उन्होने यथातथ्य कहा और रानी के पूछने पर
स्वर्ग-प्राप्ति का कारण सम्यक्त्व मूल गृहस्थ और यति धर्म
बतलाया । लघुकर्मा रानी प्रतिबोध पाई । उसने राजा से दीक्षा
के लिए अनुज्ञा माँगी । उसने कहा—मेरे घर से ही भिक्षा ग्रहण
करो तो दीक्षा लो । उसने राजा के वचनो को स्वीकार कर
आचार्य महाराज के पास उत्सवपूर्वक शिष्यत्व स्वीकार किया
और गीतार्थ बनी ।
एक वार आचार्य महाराज ने श्रुतोपयोग से भावी दुर्भिक्ष
ज्ञात कर गच्छवासी साधुओ को, देशान्तर भेज दिया और स्वय
जघा वल क्षीण होने से वही रहे । पुष्पचूला साध्वी अन्त पुर से
आहार-पानी लाकर गुरु महाराज को देती थी ।
गुरु-शुश्रूषा भाव प्रकर्ष से क्रमश उसने क्षपकश्रेणि आरोहण
कर केवलज्ञान उत्पन्न किया, तो भी वह गुरु महाराज के वैयावृत्य
से निवृत्त नही हुई । गुरु महाराज ने भी जहाँ तक उसका केवली
होना नही जाना, वहाँ तक उसका पूर्व प्रयुक्त विनय चलता ही
रहा । गुरु महाराज की जव जैसी रुचि होती, वह उसी प्रकार का
अन्नादि लाकर देती थी । एक वार वर्षा के समय भी वह आहार
ले आई । गुरु महाराज ने कहा—वत्से ! तुम श्रुतज्ञा होकर वर्षा
मे कैसे आहार लाई ? उसने कहा—भगवन् ! जहाँ अचित्त अप्काय