विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइसी बीच परमार्थ ज्ञात कर उसके दोनो मामा दुर्विकल्प त्याग
कर पुन प्रतिष्ठान आ गए थे । उन्होने परचक्र देख कर बहिन से
कहा—बहिन । जिसने तुम्हे यह पुत्र दिया है उसे ही स्मरण करो,
ताकि वही इसका सहायक होगा ।
भ्राताओ के कथन से वह भी नागराज के वचनो को स्मरण
कर शिर पर घड़ा लेकर गोदावरी मे नागह्रद पर गई । नहा कर
नागराज की आराधना की । नागराज ने तत्काल प्रत्यक्ष होकर
कहा—ब्राह्मणी ! तुमने हमे किस लिए याद किया ? उसके प्रणाम
करके सारी बात बताने पर शेषराज ने मेरे प्रताप से तुम्हारे पुत्र
का कौन पराभव कर सकता है ?—कहते हुए उसका घड़ा लेकर
ह्रद के अन्दर गया और पीयूष कुण्ड से अमृत का घडा भर कर
उसे ला दिया । उसने कहा—इस अमृत से सातवाहन के बनाये
हुए मिट्टी के घोडे, रथ, हाथ व सैनिक अभिसिंचित करो जिससे
वे सजीव होकर शत्रु सेना को भग्न कर डालेगे । यह पीयूष-घट
ही तुम्हारे पुत्र को प्रतिष्ठानपत्तन के राज्याभिषिक्त करेगा !
अवसर पर मुझे याद करना । इसके वाद नागराज अपने स्थान
चला गया । वह भी अमृतघट को लेकर अपने घर आई और उस
मिट्टी की समृद्ध सेना को सीचा । प्रात काल देवशक्ति से वह सेना
सचेतन होकर शत्रु सेना के सामने जाकर उसके साथ युद्ध करने
लगी ।
सातवाहन की सेना ने मालवपति का बल भग्न कर दिया ।
राजा विक्रमादित्य भी भग कर अवन्ती चला गया । इसके पश्चात्
सानवाहन राज्याभिषिक्त हुआ । प्रतिष्ठानपुर ने अपनी पूर्व विभूति
पुन प्राप्त की । वहाँ हाट, हवेली, मन्दिर, राजमार्ग, खाई, प्राकार
आदि से सुशोभित सुन्दर पत्तन हो गया । सातवाहन ने भी क्रमश
दक्षिणापथ को तापी तट पर्यन्त अनृण करके उत्तरापथ को साध