विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपाटलिपुत्रनगर-कल्प १५१
नामक वणिक पुत्र के साथ उसकी मित्रता हो गई। वह एक वार
उसके घर भोजन करने गया तो थाल मे भोजन परोस कर पखा
झलकर हवा करती हुई उसकी अन्निका नामक बहिन के सौन्दर्य
को देखकर उसमे अनुरक्त हो गया और दूसरे दिन चरो को भेज-
कर जयसिंह से अन्निका की याचना की। उसने कहा—मैं अपनी
बहिन को उसे दूँगा जो मेरे घर से दूर न हो और जब तक उसके
सन्तान जन्मे में उन्हे प्रतिदिन देख सकूँ। इस लिए तब तक यदि
वह मेरे घर रहे तो मै उसे अपनी वहिन दूँगा। देवदत्त के स्वीकार
करने पर शुभ मुहूर्त्त मे उनका विवाह कर दिया।
देवदत्त उसके साथ भोग भोगते हुए वहाँ रहने लगा। एक
दिन उसके पास अपने माता-पिता का पत्र आया, जिसे पढकर
उसके नेत्रो मे अश्रु-वर्षा होने लगी। कारण पूछने पर भी न बोला
तो अन्निका ने स्वयं पत्र लेकर पढा। उसमे माता पिता ने लिखा
था—बेटा ! हम दोनो वृद्ध हो गए, मृत्यु निकट है, यदि हमे जीते
देखना चाहते हो तो शीघ्र आ जाना। उसने पति को आश्वासन
देकर अपने भाई को हठ छोडने की प्रार्थना की। और पति के
साथ उत्तर मथुरा को जाते उस सगर्भा ने पुत्र जन्म दिया। देवदत्त
के “इसका नामकरण पिताजी करेंगे” ऐसा कहने पर परिजन
लोग उस बालक को 'अन्निका पुत्र' नाम से पुकारने लगे। क्रमश·
देवदत्त अपने घर पहुँचा। माता पिता को नमस्कार कर उसने
उन्हे पुत्र को अर्पण किया। उसका नाम सधीरण रखा तो भी
अन्निकापुत्र नाम ही प्रसिद्ध हुआ।
अन्निकापुत्र ने बडे होकर तरुणावस्था मे भोगो को तृणवत्
छोडकर जयसिंहाचार्य के पास दीक्षा ग्रहण कर ली और गीतार्थ
होकर आचार्य पद प्राप्त किया।
एक वार वृद्धावस्था मे विचरते हुए अन्निकापुत्राचार्य पुष्प-
भद्रपुर पहुंचे। वहाँ पुष्पकेतु राजा और पुष्पवती रानी के पुष्प-