विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचम्पापुरी-कल्प १४७
छोड देती हूँ"—कह कर राजा आदि लोगो के समक्ष बन्द ही
रहने दी। उस दिन से ले कर चिरकाल पर्यन्त जनता ने उसे
वैसो ही बन्द देखी। क्रमश विक्रम संवत् १३६० मे लक्षणावती
के सुलतान समसदीन ने शकरपुर दुर्ग के उपयोगी पाषाण लेने के
लिए उस प्रतोली को गिरा कर कपाट जोडी को भी ले लिया।
यहाँ के दधिवाहन राजा अपनी रानी पद्मावती के साथ उसका
दोहद पूर्ण करने के लिए हाथी पर आरूढ हो कर अरण्य-विहार
करने गये। हाथी के न रुकने पर अरण्य मे राजा वृक्ष की शाखा
पकड कर उतर गया। हाथी आगे चला गया और राजा अपने
नगर मे आ गया। देवी पद्मावती असमर्थता से उतर न सकी
और उस पर चढी हुई अरण्य मे गई। हथिनी से उतर कर क्रमश
अरण्य मे ही पुत्र-प्रसव किया, वह करकण्डु नामक राजा हुआ।
कलिंग मे पिता के साथ युद्ध करते माता पद्मावती आर्या ने उसे
प्रतिषेध किया। क्रमशः महावृषभ की यौवन, वार्धक्य अवस्था
को देख कर बोधि पा कर करकण्डु प्रत्येकबुद्ध हो कर सिद्धिगति
प्राप्त हुए।
यही दधिवाहन राजा की पुत्री चन्दनबाला ने जन्म लिया,
जिसने भगवान महावीर स्वामी को कौशाम्बी मे सूप के कोने मे
रहे हुए उडद के वाकुले दे कर पाँच दिन कम छ मासोपवास का
पारणा द्रव्य क्षेत्र कालभाव अभिग्रह पूर्ण होने पर कराया।
यहाँ एवं पृष्ठचम्पा मे प्रभु महावीर ने तीन वर्षाकाल विताए,
समवशरण हुए।
इसी के पास श्री श्रेणिक राजा के पुत्र अशोकचन्द्र अपर नाम
कूणिक महाराजा ने पितृशोकवश राजगृह को त्याग कर चम्पक
के चारु पुष्पोसे सुन्दर नवीन राजधानी चम्पा बसाई।
दानवीरो मे दृष्टान्तभूत, पाण्डुकुलमण्डन राजा श्री कर्ण का