विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रतिष्ठानपुराधिपति सातवाहननृप-चरित्र १४१
शूद्रक ने उन देवताओ का तर्पण करने के लिए कुण्ड बना कर
हवन करना प्रारभ-किया । सब देवता गण आये और अभिमुख
हो अपना-अपना भाग ग्रहण किया। ज्यो ही होम का धुँआ फैला,
जहाँ मायासुर था उसने भी लक्ष्मी के आदेग से शूद्रक द्वारा किये
गए होम का स्वरूप जाना और अपने भाई कोल्लासुर को होम मे
विघ्न करने के लिए भेजा। कोल्लासुर अपनी सना सहित आकाश
मे आ गया, सभी देवताओ ने आश्चर्यपूर्वक उसे देखा। वे दोनो
कुत्ते दिव्य गक्ति से उन दैत्यो के साथ युद्ध करने लगे दैत्यो ने
उन्हे मार दिया तब शूद्रक स्वय युद्ध करने लगा। उसके पास दण्ड
के अतिरिक्त दूसरा गस्त्र न होने पर भी मात्र दण्ड से ही उसने
बहुत से असुरो को मार डाला। दैत्यो ने उसकी दक्षिण भुजा काट
डाली तो वह वाम भुजा से ही दण्ड-युद्ध करने लगा। वाम भुजा
के कट जाने से दक्षिण पाँव मे दण्ड धारण कर वह युद्ध करने
लगा। दैत्यो द्वारा उसे भी काट दिए जाने पर बाँये पाँव से दण्ड
युद्ध किया तो असुरो ने उसे भी काट डाला। शूद्रक अपने दाँतो
मे दण्ड पकड कर जब युद्ध करने लगा तो दैत्यो ने उसका मस्तक
भी काट दिया।
अब आकण्ठ तृस देव गणो ने शूद्रक का मस्तक भूमि पर पडा
देख कर कहा—अहो ! अद्भुत भोग देने वाले इस विचारे का यह
क्या हुआ ? इस प्रकार सन्ताप करते हुए वे भी लडने लगे और
कोल्लासुर को मार गिराया। श्री देवी ने अमृत-सिंचन कर शूद्रक
को पूर्णाङ्ग बना दिया और जीवित कर दिया। देवी ने दोनो कुत्तो
को भी जीवित कर प्रसन्नतापूर्वक उसे खङ्गरत्न दिया और
कहा—इससे अजय रहोगे। ऐसा वर दिया।
इसके बाद शूद्रक महालक्ष्मी आदि देवताओ के साथ राजा
नातवाहन की रानी को खोजने के लिए सारे भूमण्डल मे घूमता
हुआ महार्णव मे पहुँचा। वहाँ एक ऊँचा वटवृक्ष देखकर विश्राम