विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रतिष्ठानपुराधिपति सातवाहननृप-चरित्र १४५
गिर पर लाजा विखेरने लगे। फिर हथलेवा होने वाला ही था,
राजा ने उसकी ओर देखा त्यो ही वह भयङ्कर रूप वाली राक्षसी
सी दिखाई पडी। और वह लाजा (जंवार 'की फूली) खीले भी
कठोर पाषाण के कंकड के समान शिर मे लगने लगी। राजा ने
भी—यह क्या आफत है—विचार करते हुए वहाँ से पलायन कर
दिया। वह भी पीछे लगी हुई पत्थर के टुकडे बरसाती हुई चलने
लगी। राजा वहाँ से दौडता हुआ अपनी जन्म-भूमि नाग-ह्रद मे
प्रविष्ट हुआ और वही पर मर गया। आज भो वह पीठजा देवी
प्रतोली के वाहर अपने मन्दिर मे स्थित है।
शूद्रक भी क्रमग कालिका देवो द्वारा अजारूप वन कर वापी
मे प्रविष्ट हो करुण गब्द से ठगा गया। वह उसे निकालने के
लिए वापो मे गया और द्वार पर उस तलवार के तिरछी गिर
जाने से छिन्नाङ्ग होकर पञ्चत्व प्राप्त हो गया, क्योकि महालक्ष्मी
ने वर देते समय “इसी तलवार से तुम्हारा अन्त होगा” कह
दिया था।
राजा सातवाहन के स्थान पर गक्तिकुमार का राज्याभिषेक
हुआ, तव-से लेकर आज तक कोई राजा प्रतिष्ठान—वीर क्षेत्र मे
प्रवेग नही करता।
यहाँ जो कुछ असंभव बातें हैं वे अन्य दर्शन मे कही गई है।
इस प्रकार की असंगत बातें जो हेतु से सिद्ध नही होती, उन्हे जैन
नही मानते।
यह प्रतिष्ठान-कल्प और प्रसगवश संक्षिप्त सातवाहन-चरित्र
श्रीजिनप्रभसूरि ने वनाया। इसकी ग्रन्थ सख्या १६६ और ९
अक्षर ऊपर है।
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