विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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के लिए उस पर चढ गया। वहाँ उसने पेड की शाखा पर लटकते
हुए नीचा शिर किए हुए काष्ठ की कील मे ऊँचे पाँव रहे हुए
पुरुष को देखा। वह जिह्वा फैलाकर पानी मे रहे हुए जलचर
जीवो को भक्षण कर रहा था, यह उन सभी ने देखा। गूद्रक ने
उससे पूछा—तुम कौन हो ? इस प्रकार क्यो लटक रहे हो ? उसने
कहा—मैं मायामुर का छोटा भाई हूँ। मेरा वडा भाई कामोन्मादी
है, उसने रावण की भाँति सीता जैसी सातवाहन की महिषी को
रमण करने की इच्छा मे हरण कर लिया है। वह पतिव्रता है,
उसे विल्कुल नही चाहती। मैने भाई से कहा—आपको परदारा
का अपहरण करना योग्य नही है क्योकि अपने विक्रम से सारे
ससार को आक्रान्त करने वाला रावण भी परस्त्रीरमण की
इच्छा से कुलक्षय को प्राप्त हुआ था। मेरे इस प्रकार कहने पर
मायामुर क्रुद्ध हो गया और मुझे इस वट की शाखा मे टगाकर
इस प्रकार विडम्बित किया है। मैं जिह्वा फैला कर समुद्र मे चलने
वाले जलचरादि का भक्षण कर जीवन धारण कर रहा हूँ। यह
सुन कर शूद्रक ने कहा—मैं भी उन्ही राजा सातवाहन का गूद्रक
नामक सेवक हू। और उसी देवी की शोध के लिए आया हू। उस
असुर ने कहा—यदि ऐसा है तो मुझे छुडाओ। जिससे मैं तुम्हारे
साथ चल कर उस देवी को दिखाऊँ। मायामुर ने अपने स्थान के
चारो ओर लाक्षा का दुर्ग बना रखा है वह निरन्तर प्रज्वलित
रहता है अत उसे उल्लघन कर अन्दर जाकर उसे मार कर देवी
को लौटाना है।
यह सुनकर शूद्रक ने उसके काष्ठ-बन्धन काट डाले और
उसके पीछे-पीछे देवताओ से घिरे हुए प्रस्थान कर दुर्गोल्लघन
पूर्वक उस स्थान मे जा पहुँचा। मायामुर देवगणो को देख कर
अपनी सेना को साथ लेकर उनसे युद्ध करने लगा। सेना के मर
जाने से वह स्वयं मैदान मे उतर पडा, गूद्रक ने क्रमश उस