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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 220, कुल 442 में से

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पृष्ठ 220

प्रतिष्ठानपुराधिपति सातवाहन नृप-चरित्र १३७

नगर के बाहर जाने लगा । आगे कान लगाकर चलते हुए उसने
सुना कि कोई गोदावरी के स्रोत मे रो रहा है । शूद्रक परि-
करबद्ध होकर तिरता हुआ ज्योही नदी के बीच मे पहुँचा, त्योही
प्रवाह मे बहते हुए और रोते हुए एक पुरुष को देखकर वह
बोला—अरे ! तुम कौन हो ? किस लिए रो रहे हो ? यह सुनकर
वह और भी ज़ोर-ज़ोर से रुदन करने लगा । अत्यन्त आग्रह से
पूछने पर वह स्पष्ट बोला—हे साहसिकशिरोमणि ! मुझे यहाँ से
निकाल कर राजा के समीप ले चलो, जिससे मै वहाँ अपना
वृत्तान्त कहूँ ।
उसके ऐसा कहने पर शूद्रक ने उसे उठाने का प्रयत्न किया
किन्तु वह उठ न सका । शूद्रक ने सोचा—कही नीचे से किसी
राक्षस ने न पकड-रखा हो । इस आशंका से उसने तलवार चलाई
तब मात्र शिर को वह ऊचा उठा पाया । हाथ मे आया हुआ शिर
छोटा सा था और उसमे से रुधिर झर रहा था । उसे देख कर
शूद्रक विषादपूर्ण होकर सोचने लगा—अहो ! प्रहार न करने वाले
पर भी प्रहार करने वाले मुझको धिक्कार है, मै शरणागत का
घातक हूँ । इस प्रकार आत्मनिन्दा करता हुआ वह वज्राहत के
समान क्षण भर के लिए मूर्छित हो गया । तत्पश्चात् चेतना आने
पर वह चिरकाल चिन्ता करने लगा कि मै अपनी इस दुश्चेष्टा को
को राजा से कैसे निवेदन करूंगा । इस प्रकार लज्जित मन से
वही काष्ठ की चिता बना कर उसमे अग्नि प्रज्वलित कर ज्यो ही
मस्तक को लेकर प्रवेश करने लगा, त्यो ही मस्तक ने कहा—हे
महापुरुष ! ये साहस आप क्यो कर रहे हैं। मैं तो राहु के समान
शिरमात्र ही हूँ ! अत वृथा खेद मत करो । और कृपा कर मुझे
राजा के पास ले चलो । उसकी यह बात सुन चमत्कृत चित्त मे—
यह प्राणी है—ऐसा मानता हुआ प्रसन्नता से शूद्रक उस शिर को
रेशमी कपडे मे लपेट कर प्रात काल सातवाहन राजा के पास