विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयह कैसे जानते हैं ? सूरि महाराज ने कहा—भद्रे ! जिनागमो से
सब कुछ मालूम होता है । पुष्पचूला ने कहा—भगवन् ! किस कर्म
से नरक प्राप्त होते हैं ? गुरु महाराज ने कहा—भद्रे ! महा
आरंभ-परिग्रह और गुरुविरोधी होकर पञ्चेन्द्रियवध—मासाहार
से प्राणियोका नरक पतन होता है ।
क्रमश देव ने उसे स्वप्न मे स्वर्ग दिखाये । राजा ने उसी
प्रकार पाखण्डियो से पूछा और उनके परस्पर-विरोधी विरोधी
वचन पाकर उन्हे विसर्जित कर आचार्य महाराज से स्वर्ग का
स्वरूप पूछा । उन्होने यथातथ्य कहा और रानी के पूछने पर
स्वर्ग-प्राप्ति का कारण सम्यक्त्व मूल गृहस्थ और यति धर्म
बतलाया । लघुकर्मा रानी प्रतिबोध पाई । उसने राजा से दीक्षा
के लिए अनुज्ञा माँगी । उसने कहा—मेरे घर से ही भिक्षा ग्रहण
करो तो दीक्षा लो । उसने राजा के वचनो को स्वीकार कर
आचार्य महाराज के पास उत्सवपूर्वक शिष्यत्व स्वीकार किया
और गीतार्थ बनी ।
एक वार आचार्य महाराज ने श्रुतोपयोग से भावी दुर्भिक्ष
ज्ञात कर गच्छवासी साधुओ को, देशान्तर भेज दिया और स्वय
जघा वल क्षीण होने से वही रहे । पुष्पचूला साध्वी अन्त पुर से
आहार-पानी लाकर गुरु महाराज को देती थी ।
गुरु-शुश्रूषा भाव प्रकर्ष से क्रमश उसने क्षपकश्रेणि आरोहण
कर केवलज्ञान उत्पन्न किया, तो भी वह गुरु महाराज के वैयावृत्य
से निवृत्त नही हुई । गुरु महाराज ने भी जहाँ तक उसका केवली
होना नही जाना, वहाँ तक उसका पूर्व प्रयुक्त विनय चलता ही
रहा । गुरु महाराज की जव जैसी रुचि होती, वह उसी प्रकार का
अन्नादि लाकर देती थी । एक वार वर्षा के समय भी वह आहार
ले आई । गुरु महाराज ने कहा—वत्से ! तुम श्रुतज्ञा होकर वर्षा
मे कैसे आहार लाई ? उसने कहा—भगवन् ! जहाँ अचित्त अप्काय