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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 229

३५. चम्पापुरी-कल्प
दुर्नीति को भग करने वाले अंग देग जनपद के भूषणरुप
प्रधान तीर्थ चम्पापुरी का कल्प कहता हूँ । यहाँ त्रिभुवन-पूज्य
बारहवे तीर्थङ्कर श्री वासुपूज्य जिनेश्वर के गर्भावतरण-च्यवन,
जन्म, प्रव्रज्या, केवलज्ञान और निर्वाण रुप पाँच कल्याणक
हुए हैं ।
यही श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र के पुत्र मघव राजा की पुत्री लक्ष्मी
की कुक्षी से आठ पुत्रो के ऊपर रोहिणी नामक पुत्री उत्पन्न हुई ।
उसने स्वयवर मे अशोक राजा के कण्ठ मे वरमाला डाली और
उसके साथ विवाह कर पट्टरानी हुई । क्रमशः उसके आठ पुत्र और
चार पुत्रियाँ हुई । एक दिन श्री वासुपूज्य स्वामी के शिष्य रूप्य-
कुम्भ-स्वर्णकुम्भ के मुख से सुखी होने के हेतु भूतपूर्व जन्म मे किये
हुए रोहिणी तप को सुन कर उद्यापन विधि से आराधना कर
सपरिवार मुक्ति प्रप्त हुई ।
यहाँ भूमण्डल के इन्द्र सहश करकण्डू राजा ने पहिले काद-
म्बरी अटवी मे कलिगिरि की उपत्यका मे रहे हुए कुण्ड नामक
सरोवर मे श्री पार्श्वनाथ भगवान को छद्मस्थावस्था मे विचरते
हुए हस्ति-व्यन्तरानुभाव से कलिकुण्ड तीर्थ रूप से प्रतिष्ठापित
किया था ।
फिर यहाँ सुभद्रा महासती ने तीन विकट पाषाणमय प्रतो-
लियो के वन्द कपाट-सम्पुटो को अपने शील माहात्म्य द्वारा कच्चे
सूत-तन्तु-वेष्टित चलनी से कुएँ का जल निकाल कर उससे
सिंचित कर उद्घाटित किये थे । चारो मे से एक प्रतोली—"मेरे
जैसी अन्य सच्चरित्रा सती हो, उसके उघाडने के लिए वन्द ही