विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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भाई गली मे क्यो नही आया ? उसने कहा--श्रेष्ठिवर ! मेरा भाई
देवताओ मे रहता है। वणिक ने कहा—यह कैसे ? वह बोली—
ककण बँधने से लेकर विवाह-प्रकरण तक चार दिन मनुष्य अपने
आपको देवताओ के बीच वसता हुआ मानता है, वैसे वैसे उत्सव
देखने के कुतुहल से वैसा अनुभव करता है। यह वात राजा तक
पहुँची, राजा ने विचार किया—अहो ! क्या मै देवताओ मे नही
रहता ? मैं भी चार दिनो के अनवरत विवाहोत्सवमय देवस्वरूप
रहूगा । यह सोचकर चार वर्णो मे जिन-जिन कन्याओ को युवती
या रूपवती देखता सुनता, उन्ही को उत्सवपूर्वक विवाह लाता
था।
इस प्रकार बहुत सा समय बीत जाने पर लोगो ने विचार
किया—क्या भविष्य मे सभी वर्ण वाले लोग नि सन्तान ही रहेगे ?
सब कन्याओ के साथ तो राजा ही विवाह कर लेता है। स्त्री के
विना सन्तान कहाँ से होगी ? इस प्रकार लोगो के दुखी होने पर
‘विवाह वाटिका' नामक गाँव मे रहने वाले एक ब्राह्मण ने पीठजा
देवी का आराधना करके निवेदन किया-- भगवती ! हमारे सतानो
का विवाह कैसे होगा ? देवी ने कहा—ब्राह्मण ! मैं तुम्हारे घर मे
कन्या के रूप मे अवतार लूगी। जब मेरे लिए राजा प्रार्थना करे
तो मुझे राजा को दे देना, शेष मैं सब संभाल लूंगी ! वैसा ही
हुआ । राजा ने उसे रूपवती सुनकर विप्र से याचना की। वह भी
बोला—मैंने कन्या दी, किन्तु महाराज वही पधार कर मेरी कन्या
के साथ विवाह करे ! राजा ने स्वीकार कर लिया। ज्योतिषी के
दिए हुए लग्न मे राजा विवाह करने के लिए चला और उस गाँव
श्वसुर के घर पहुँचा। देशाचार के कारण वर और वधू के बीच
मे पडदा डाल दिया गया। अजलि मे खील (लाजा, जँवार की
फूली) भर कर ज्यो ही दोनो पडदा हटा कर एक दूसरे के