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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 233, कुल 442 में से

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पृष्ठ 233

३६. पाटलिपुत्रनगर-कल्प
श्री नेमिनाथ भगवान को नमस्कार करके अनेक पुरुष-रत्नो
के जन्म से पवित्रित पाटलिपुत्र नामक नगर का कल्प प्रस्तुत
करता हूँ ।
पूर्वकाल मे महाराजा श्रेणिक का निधन होने पर उसके पुत्र
कूणिक ने पितृगोक से चम्पापुरी नई वसाई । उसकी मृत्यु के
पश्चात् उसका पुत्र उदयि चम्पा की राजगद्दी पर बैठा । वह भी
अपने पिता के क्रीडास्थान-राजसभा-शयनागार-भोजनालय आदि
स्थानो को देखकर अत्यन्त गोकाकुल हो जाता था । तब अमात्य
लोगो की अनुमति से नया नगर बसाने के लिए नैमित्तिक लोगो
को स्थान-गवेषणार्थ आदेश दिया । वे सर्वत्र उन स्थानो को देखते
हुए गगा-तट पर गये । वहाँ पाडल कुसुम वाले पाटलि वृक्ष को
देखकर उसकी गोभा से चमत्कृत हुए । उसकी गाखा पर बैठे हुए
चाषपक्षी के मुँह मे कीटकादि जन्तु स्वयमेव आकर गिरते देखकर
सोचा—अहो ! इस चाप पक्षी के मुँह मे स्वयं कीडे आकर गिर
रहे हैं तो इस स्थान पर नगर बसाने से राजा को स्वयं लक्ष्मी
प्राप्त होगी । उन्होने राजा से विज्ञप्ति की । वह भी अत्यन्त प्रसन्न
हुआ । वहाँ एक वृद्ध नैमित्तिक ने कहा—देव ! यह पाडल वृक्ष
साधारण नही है । पूर्वकाल मे ज्ञानियो ने कहा है कि—
“महामुनि की खोपडी मे उत्पन्न यह पवित्र पाटल वृक्ष है,
विगेश इसका मूल जीव एकावतारी है ।”
राजा ने कहा—वे महामुनि कौन ? नैमित्तिक ने कहा—देव !
सुनिये । उत्तर मथुरा मे रहने वाला देवदत्त नामक वणिक पुत्र
एक वार पर्यटन करने के लिए दक्षिण मथुरा गया । वहाँ जयसिंह