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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 232

चम्पापुरी-कल्प १४९
यहाँ के पूर्ण भद्र चैत्य मे श्री वीर प्रभु ने कहा—जो अष्टापद
पर आरोहण करता है वह उसी भव मे मोक्षगामी है।
यहाँ श्री वीर प्रभु का उपासक पालित नामक वणिक हुआ।
उसके समुद्र यात्रा मे जन्मा हुआ समुद्रपाल नामक पुत्र था जिसने
किसी अपराधी को मारने के लिए ले जाते देख कर प्रतिबोधित
मोक्ष प्राप्त किया।
यहाँ के सुनन्द श्रावक ने साधुओ के मल-दुर्गन्ध की निन्दा
की और मर कर कौशाम्बी मे श्रेष्ठि पुत्र हुआ, व्रत ग्रहण किया।
दुर्गन्ध उदीरण होने पर कायोत्सर्ग ध्यान द्वारा देवता को आकृष्ट
कर अपने अग को सुगन्वित कराया।
यहाँ कौणिकार्य शिष्य अगर्षि रुद्रक ने अभ्याख्यान सविधान
के और सुजात प्रियगु आदि कई सविधानो को बनाया।
इत्यादि नाना प्रकार के संविधानक रत्न प्रकटित नाना वृत्त-
निधान-घटनाओ वाली यह नगरी है। इस नगरी की प्राकार-
भित्ति को प्रिय सखी की भाँति प्रतिक्षण सर्वाङ्ग आलिङ्गन करती
पवित्र घन रसपूरितान्तर वाली उत्तम नदी है।
उत्तमोत्तम नर-नारी रूपी मुक्तामणि को प्रसव करने मे शुक्ति
के सदृश यह नगरी विविध अद्भुत वस्तु शालिनी मालिनी
जयवन्त है।
भगवान् वासुपूज्य स्वामी की जन्मभूमि को विद्वान लोग
उनकी भक्तिपुरस्सर स्तवना करते हैं। श्री जिनप्रभ सूरि ने चम्पा
नगरी का यह कल्प कहा।
श्री चम्पापुरी का कल्प समाप्त हुआ। इसकी ग्रन्थ-श्लोक
सख्या ४७ है।