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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 223, कुल 442 में से

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पृष्ठ 223

१४० विविध तीर्थ-कल्प

राजा ने साकल से बँधे हुए उन दोनो कुत्तो को अपनी शय्या
के पायो से बाँध दिया। गूद्रक को चारो ओर पर्यटन करते हुए भी
कही उसे देवी की वार्ता तक नही मिली तो उसने सोचा—"मेग
यह अपयश प्रगट हुआ है, मैं स्वामी-द्रोही गिना जाऊँगा और
लोग कहेगे कि देवी का इसी ने अपहरण करवा दिया। जब कही
भी उसका पता नही लग रहा है तो मुझे अब मरण का ही शरण
हो।" इस विचार से उसने काष्ठ को चिता बनाई और उसमे
अग्नि प्रज्वलित कर ज्यो ही प्रवेश करने लगा त्यो ही देवाधिष्ठित
कुत्तो ने जाना कि हमारा स्वामी निधन को प्राप्त हो रहा है। वे
दोनो दैव-शक्ति से साकले तोडकर अविलम्ब वहाँ जा पहुँचे जहाँ
गूद्रक ने चिता बनाई थी। उन्होने दाँतो से केशो को पकड कर
गूद्रक को चिता से बाहर निकाल लिया। उसने भी अकस्मात् उन
कुत्तो को देखकर विस्मित मन से कहा—अरे पापियो ! अशुभ के
समान आपने यह क्या किया ? राजा के मन का विश्वास नष्ट
हो जायगा और जानेगा कि जामिनो को भी वह अपने साथ ले
गया। दोनो कुत्ते बोले—धैर्य रखिये और हमारी दिखायी हुई
दिशा मे चलिये। जल्दो मत करिये। ऐसा कह कर वे आगे हो
गए। वह भी उनके साथ चला और क्रमश कोल्लागपुर पहुँचे।
वहाँ के महालक्ष्मी देवी के मन्दिर मे प्रवेश किया गूद्रक ने देवी
को पूजा कर कुगासन अर दैठे हुए तीन उपवास किए। भगवती
महालक्ष्मी प्रत्यक्ष होकर बोली—वत्स ! क्या खोज रहे हो। गूद्रक
ने कहा—भगवती ! सातवाहन राजा की महिषी का पता बतला-
डये, वह कहाँ है। किसने अपहरण किया है। श्री देवी ने कहा—
सब यक्ष-राक्षस-भूत आदि देव गणो को एकत्र कर यह बात मैं
तुम्हे बतलाऊँगी। किन्तु उन सब के लिए तुम्हे वलि-उपहार आदि
एकत्र कर रखना चाहिए। जब तक वे वलि-पूजा ग्रहण कर प्रसन्न
न बने तब तक तुम विघ्नो की रक्षा करते रहना।