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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 218

प्रतिष्ठानपुराधिपति सातवाहन नृप-चारित्र १३५
कर अपना सवत्सर प्रवर्त्तित किया। वह जैन हुआ, उसने जन-
नयनशीतलकारी जिन-चैत्य बनवाये। पचास वीरो ने भी प्रत्येक
ने अपने अपने नामाङ्कित जिनालय नगर मे कराये।
प्रतिष्ठानपत्तन कल्प समाप्त हुआ, इसकी श्लोक सख्या ४७ है।
३४. प्रतिष्ठानपुराधिपति सातवाहन
नृप चरित्र
अब प्रसङ्गवश अन्य दर्शनियो के सिद्धातो मे लोकप्रसिद्ध
सातवाहन का शेष चरित्र भी कुछ कहते हैं। श्री सातवाहन जब
पृथ्वी का पालन कर रहे थे उस समय प्रतिष्ठाननगर मे पचास
वीर और बाहर भी पचास वीर निवास करते थे। इधर इसी नगर
मे एक ब्राह्मण का शूद्रक नामक अभिमानी पुत्र था, वह भी दर्प
पूर्वक युद्ध-श्रम करता रहता था जो पिता द्वारा अपने कुल के
लिये अनुचित बतलाकर निषेध करने पर भी नही मानता था।
एक दिन पिता के साथ जाते हुए बारह वर्षीय शूद्रक ने देखा
राजा सातवाहन नगर मे रहने वाले वापला, खूदला आदि पचास
वीरो के साथ व्यायाम करते हुए बावन हाथ प्रमाण वाली शिला
को उठा रहे थे। किसी वीर ने चार अगुल, किसी ने छ अगुल
और किसी ने आठ अंगुल भूमि से शिला को ऊँची उठाया। राजा
ने जानु तक ऊँचा उठा लिया। यह देखकर बल जागृत होने मे