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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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१४८ विविध तीर्थ-कल्प
राज्य भी यही था। आज भी शृंगार-चतुरिका आदि उनके
अवदात स्थान इस नगरी मे हैं।
यहाँ सम्यग्दृष्टि सुदर्शन सेठ को दधिवाहन राजा की रानी
अभया ने संभोगार्थ उपसर्ग किये। राजा के वचनो से मारने के
लिए ले जाने पर अपने निर्दोष शील-सम्पत्ति के प्रभाव से आकृष्ट
शासनदेवता के सानिध्य से शूली का स्वर्णमय सिंहासन हो
गया। और तीक्ष्ण तलवार भी सुगन्धित पुष्पमाला हो कर मन
को आनन्ददायी बन गई।
भगवान महावीर का अग्रश्रावक कामदेव भी यही हुआ जो
अठारह करोड स्वर्ण एव दश हजार गायो वाले छह गोकुलो का
स्वामी था। भद्रा का वह पति था। पौषधशाला मे मिथ्यादृष्टि
देव द्वारा पिशाच, हाथी, साँप आदि का रूप करके उपसर्ग करने
पर भी अक्षुब्ध रहा। समवशरण मे भगवान ने स्वय इनकी
प्रशसा की।
यही विचरते हुए चौदह पूर्वधर श्री शय्यंभवसूरि ने राजगृह
से आये हुए अपने मनक नामक पुत्र को दीक्षित करके श्रुतोपयोग
से उसकी छ मास आयु अवशिष्ट ज्ञात कर उसके अध्ययनार्थ
पूर्वो से दशवैकालिक सूत्र की रचना की। उनमे आत्म-प्रवाद से
छज्जीवणिया, कर्म-प्रवाद पूर्व से पिण्डैषणा, सत्य-प्रवाद पूर्व से
वाक्यशुद्धि एव अवशिष्ट अध्ययन प्रत्याख्यान पूर्व की तीसरी
वस्तु से लिए।
यहाँ के निवासी कुमारनन्दी स्वर्णकार ने अपने विभव वैभव
के मद से अभिभूत हो तीव्र ज्वाला मे प्रविष्ट हो पचशैलाधिपत्य
प्राप्त किया। पूर्व भव के मित्र से बोध पा कर गोशीर्षचन्दन-
मय जीवित स्वामी की अलकारविभूषित देवाधिदेव श्री महावीर
स्वामी की प्रतिमा निर्मित की।