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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 226, कुल 442 में से

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पृष्ठ 226

प्रतिष्ठानपुराधिपति सातवाहननृप-चरित्र १४३

तलवार के द्वारा मायासुर को मार डाला । और उस घटावलवी
विमान मे देवी को चढा कर सब देवगण शीघ्र ही प्रतिष्ठानपुर की
ओर प्रस्थान कर गए ।
इधर दग दिन की अवधि पूर्ण होते जानकर राजा विचारने
लगा—न तो मेरी महादेवी आई और न गूद्रक वीर और न वे दोनो
कुत्ते ही वापस लौटे । यह सब विनागलीला मुझ कुबुद्धि ने ही
करवायी । इस प्रकार चिन्ता करते हुए सपरिवार प्राणत्याग की
इच्छा से नगर के वाहर उसने चन्दनादिकाष्ठ से चिता तैयार कर-
वायी । ज्योही वह परिजनसमूह को चिता मे डालने लगा त्योही
देवगणो मे से एक वधाई देने वाला वहाँ आ पहुचा और विनय-
पूर्वक राजा से निवेदन किया—देव ! महादेवी के आगमन से
भाग्यशाली हैं ! देव की इस कर्णमनोहर वात को सुन आनद कद
कलित चित्त से राजा ने ज्यो ही ऊँचा देखा—आकाग मे देव-
समूह और गूद्रक दिखलाई पडे । गूद्रक और महादेवी विमान से
उतर कर राजा के चरणो मे गिर पडे । गातवाहन राजा ने
आनन्दसहित गूद्रक का अभिनन्दन करते हुए उसे अर्द्ध राज्य
दिया । राजा, महादेवी के साथ गूद्रक का चारु चरित सुनता
हुआ उत्सवपूर्वक नगर मे प्रविष्ट हो राज्य-लक्ष्मी भोगने लगा ।
इस प्रकार हाल राजा के भाँति-भाँति के अवदान हैं, कितनो
का वर्णन किया जा सकता है ? इसी ने गोदावरी नदी के किनारे
महालक्ष्मी को स्थापित किया और प्रासाद मे उन उन स्थानो मे
अन्यान्य देवता भी यथायोग्य स्थापित किये । इस प्रकार राजा
चिरकाल तक विगाल राज्य का उपभोग करता रहा ।
नगर की वणिक-वीथी मे कोई काष्ठभारवाहक प्रतिदिन
अच्छी लकडियाँ लाकर बेचा करता था । किसी दिन वह भार
बेचने नही आया । वणिक ने उसकी वहिन से पूछा-आज तुम्हारा