विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रतिष्ठानपुराधिपति सातवाहन नृप-चरित्र १३९
पूर्वक पकड़ लिया । उसके साहस से विमान स्तब्ध हो गया और
आगे नही चला । मायासुर ने सोचा—यह विमान आगे क्यो नही
चल रहा है । फिर ज्यो ही हाथ मे घट को पकडे उस वीर को
देखा, तो उसका हाथ काट डाला । वीर पृथ्वी पर गिर पड़ा और
विमान को असुर आगे ले चला ।
देवी के अपहरण-वृत्तान्त को राजा ने सुना और ४९ वीरो
को आदेश दिया कि यह देवी का किसने अपहरण किया है, खोज
करिए । वे लोग पहिले से ही शूद्रक से असूया रखते थे अत-
मौका पाकर बोले—महाराज ! शूद्रक ही जाने, वही उस
शिर को लाया था जिसने देवी का अपहरण कर लिया । राजा ने
शूद्रक पर कुपित होकर उसे शूली पर चढाने की आज्ञा दी ।
तत्कालीन देशरीति के अनुसार शूद्रक पर रक्त चन्दन का
लेप किया गया और उसे शकट मे सुलाकर गाढा बाँध कर शूली
पर चढाने के लिए ज्यो ही राजपुरुष चले त्यो ही ४९ वीर एकत्र
होकर शूद्रक से कहने लगे—हे महावीर ! आप रण्डा के समान
किस लिए मर रहे हो ? “अशुभस्य कालहरणम्” न्याय से राजा
से कुछ दिन की अवधि माँगो और देवी का अपहरण करने वाले
की सर्वत्र खोज करो । निष्कारण ही क्यो अपने वीरत्व की कीर्त्ति
को नष्ट कर रहे हो ! उसने कहा—तब राजा के पास जाकर यह
बात निवेदन करिए ! उन्होने वैसा ही किया । राजा ने शूद्रक को
वापस बुलाया । उसने भी अपने मुख से निवेदन किया—महाराज
अवधि दीजिए, जिससे मैं प्रत्येक दिशा मे देवी का अपहरण करने
वाले की खोज करूँ । राजा ने उसे दस दिन की अवधि दी ।
शूद्रक के घर उसके दो सहचारी कुत्ते थे । राजा ने कहा—तुम
दोनो कुत्तो को जमानत स्वरूप हमारे पास रख दो और स्वय देवी
के अनुसंधानार्थ पृथ्वी पर भ्रमण करो । वह वीर भी आदेश प्रमाण
है । कह कर रवाना हो गया ।