विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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पहुँचा । नमस्कार किया । राजा ने पूछा—शूद्रक ! यह क्या है ?
वह बोला—देव ! यह वही है जिसकी रुदन-ध्वनि श्रीमान् ने
रात्रि मे सुनी थी । फिर उसने उसका सारा वृतान्त निवेदन कर
दिया ।
राजा ने उस मस्तक से पूछा—अहो ! तुम कौन हो ? किस
लिए यहाँ आना हुआ ? मस्तक ने कहा—महाराज ! आपकी
कीर्ति दोनो कानो से सुन कर करुण रुदन के छल से अपने को
जतला कर मैं आपके पास आया हूँ । आपके दर्शन किए, आज मेरे
उभय नेत्र कृतार्थ हुए ! राजा ने पूछा—तुम कौनसी कला ठीक
ढंग से जानते हो ? उसने कहा—देव ! मैं संगीत कला जानता हूँ !
फिर राजा की आज्ञा से पहले नही गाया हुआ गीत गाने लगा !
उसकी गायन-कला से सारी राजसभा मोहित हो गई । वास्तव मे
वह मायासुर नाम का असुर था और वैसी माया बना कर राजा
की रानी, जो अत्यन्त रूपवती थी उसका हरण करने के लिए
आया हुआ था । पर यह किसी को पता नही लगा । लोगो ने तो
शिरमात्र देखने से उसका नाम प्राकृत—लोक भाषा मे सीपुला रख
दिया । तब से प्रतिदिन उस तुम्बुरु के द्वारा मधुरतर गाते रहने
पर उसका सारा स्वरूप महादेवी ने सुना और दासी के द्वारा
राजा को निवेदन कर उस शिर को अपने पास मगवाया ।
रानी प्रतिदिन उससे संगीत सुनने लगी ।
कुछ दिन बाद मायासुर ने अवसर पाकर रानी का अपहरण
कर लिया और अपने घण्टावलम्बी नामक विमान मे उसे चढा
लिया । रानी करुण क्रन्दन करने लगी—हाय, मेरा किसी ने अप-
हरण कर लिया, पृथ्वी पर क्या कोई ऐसा वीर है जो मुझे छुडा
ले ! खुहला वीर ने रानी की यह पुकार सुन कर दौडते हुए
आकाश मे उछल कर उस विमान का घटा अपने हाथ से दृढता