विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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चूल, पुष्पचूला नामक पुत्र-पुत्री युगल थे । वे दोनो साथ-साथ
वढते-खेलते परस्पर अत्यन्त प्रीति वाले हो गए । राजा ने देखा
इन दोनो का वियोग कराने से निश्चय ही ये जीवित नही रहेगे ।
और मै भी इनका विरह नही सहूँगा, अत इनका परस्पर विवाह
कर दूँ तो अच्छा हो, यह विचार कर मन्त्री-मित्र और नागरिको
से उसने छलपूर्वक पूछा—यदि अन्त पुरमे रत्न उत्पन्न हो तो
उसका स्वामी कौन ? उन लोगो ने कहा—
देव ! अन्त पुर का तो कहना ही -या ? जिस देश मे रत्न
उत्पन्न हो उसे राजा स्वेच्छानुसार विनियुक्त करे, इसमे किसी को
क्या आपत्ति है।
यह सुनकर राजा ने अपना अभिप्राय कहा । महागनी के मना
करने पर भी राजा ने उनका सबध घटित कर दिया । दोनो पति-
पत्नी सासारिक भोग करने लगे । रानी ने पति के अपमान से
विरक्त होकर व्रत ग्रहण किया और स्वर्ग मे देव हो गई ।
राजा पुष्पकेतु का जीवन अध्याय शेष होने पर पुष्पचूल राजा
हुआ । देव ने अवधिज्ञान प्रयोग से उसका अकृत्य जान कर पुष्प-
चूला को स्वप्न मे नरक और वहां के दुख दिखलाये । उससे
प्रबुद्ध होकर भय से पति को सारा निवेदन किया, उसने शांति के
उपाय किये । वह देव प्रति रात्रि मे उसे नरक दिखाता था ।
राजा ने समस्त तीर्थिक लोगो को बुलाकर पूछा—नरक कैसे होते
हैं ? किसी ने गर्भावास को, किसी ने कारावास को, किसी ने
दारिद्रय को और किसी ने परतन्त्रता को नरक बतलाया । रानी
उनके विसवादी वचनो को सुनकर मुख मोडकर बैठ गई ।
राजा ने अग्निकापुत्र आचार्य को बुलाकर उन्हे पूछा ।
उन्होने जैसा रानी ने देखा था, वैसा ही नरक स्वरूप बतलाया ।
रानी ने कहा—भगवन् ! आपने भी क्या स्वप्न देखा है, अन्यथा