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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 219, कुल 442 में से

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पृष्ठ 219

१३६ विविध तीर्थ-कल्प

शूद्रक बोला—अहो ! क्या आप लोगो मे से कोई इस शिला को
मस्तक तक नही उठा सकता ? उन लोगो ने ईर्ष्यापूर्वक कहा—
यदि अपने को समर्थ मानते हो तो तुम्ही उठाओ। यह सुनकर
शूद्रक ने उस शिला को आकाश मे उछाला जो दूर तक ऊँची
चली गई। शूद्रक ने कहा—आप लोगो मे जो समर्थ हो वह इस
गिरती हुई शिला को रोक ले ! सातवाहनादि वीरो ने भयाक्रान्त
नेत्रो से उसी से अनुनयपूर्वक कहा—अहो महाबली ! हमारे प्राणो
की रक्षा करो ! रक्षा करो ! शूद्रक ने उस गिरती हुई शिला को
मुष्टिप्रहार किया जिससे उसके तीन टुकडे हो गए। उनमे एक
टुकडा तीन योजन पर जाकर गिरा, दूसरा टुकडा नागहृद मे
और तीसरा टुकडा प्रतोली द्वार के चौरस्ते पर जाकर गिरा जो
आज भी वैसे ही लोगो द्वारा देखा जाता है।
शूद्रक के बल से चमत्कृत होकर राजा ने उसे अत्यन्त सम्मान-
पूर्वक नगर का आरक्षक नियुक्त कर दिया। अन्य शस्त्रास्त्रो का
प्रतिषेध कर उस दण्ड धारण करने वाले का दण्ड हो आयुध बना।
वह शूद्रक भी वाहर रहने वाले वीरो को अनर्थ निवारण करने के
उद्देश्य से नगर मे प्रविष्ट नही होने देता था।
एक वार अपने महल के छत पर सोया हुआ राजा सातवाहन
शरीर-चिन्ता के लिए उठा। उसने नगर के वाह्य भाग मे करुण
रुदन सुना तो पराये दुख से दुखी हृदय से वह तलवार लेकर घर
से निकल पडा। रास्ते मे शूद्रक ने देखा और विनयपूर्वक नमस्कार
कर अर्द्धमहानिशा मे निकल पडने का कारण पूछा। राजा बोले—
यह नगर के समीप करुण क्रन्दन की ध्वनि सुनाई दे रही है इसका
कारण जानने के लिए मैं जा रहा हूँ। राजा के ऐसा कहने पर
शूद्रक ने निवेदन किया—देव ! आप प्रतीक्षा करते हुए भवन को
अलंकृत करने पधारिये, मैं ही उसकी खोज कर आऊँगा। ऐसा
कह कर राजा को लौटा दिया और स्वय गगन-ध्वनि के अनुसार