विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
अवन्ती देशस्थ अभिनन्दनदेव-कल्प १२९
तब उन्होने उन सात या नौ टुकडो को पूर्ववत् यथावस्थित जोड
कर प्रतिमा प्रकट कर दी । वडजा ने प्रतिमा जुडी हुई देखी और
कलुषितहृदय निषाद लोगो का सस्पर्श ही विषादपूर्ण समझ कर
उस सुश्रावक ने सात्विक रीति से अभिग्रह किया कि जब तक मै
इस प्रतिमा को अखण्ड न देखू तब तक अन्न जल नही लूगा !
सेठ को प्रतिदिन उपवास करते देख उस विम्ब-अभिनदन
स्वामी—के अधिष्ठायक देव ने वडजा को स्वप्न मे कहा—इस
प्रतिमा के नवो खण्डो की सन्धि को चन्दन लेप से पूर्ण करो तो
यह अखण्डता प्राप्त करेगी ! प्रात काल मे उस बुद्धिमान ने प्रमोद-
पूर्वक वैसा ही किया । भगवान की देह अखण्ड हो गई, चन्दन के
लेपमात्र से सारी सन्धियाँ मिल गई । उसने तत्काल विशुद्ध श्रद्धा-
पूर्वक भगवान की पूजा करके भोजन किया । और उस वणिक ने
अत्यन्त हर्षपूर्वक मेव लोगो को गुडादि दिया ।
उसके वाद उस वणिक ने रत्न-प्राप्ति की भाँति अत्यन्त प्रस-
न्नतापूर्वक सूने खेडे मे पीपल वृक्ष के नीचे वेदी वधाकर उस
प्रतिमा को मण्डित किया । तब से श्रावकसघ और चारो वर्ण के
लोग चारो दिशाओ से आकर यात्रोत्सवादि आयोजन करने लगे !
वहाँ अभयकीर्त्ति, भानुकीर्त्ति, आवा, राजकुल, मठपति आचार्य
चैत्यचिन्ता—सार-सभाल करते हैं ।
प्राग्वाट वशावतश थेहा का पुत्र हालाशाह नि सन्तान था ।
उसने पुत्र के लिए मानता की—यदि मेरे पुत्र हो गया तो मै यहाँ
मन्दिर वनवाऊंगा ! क्रमश अधिष्ठायक देव के सान्निध्य से उसके
कामदेव नामक पुत्र हुआ । हालाशाह ने वहाँ ऊँचे शिखर वाला
चैत्य वनवाया । क्रमश भावड शाह की पुत्री कामदेव को पर-
णाई । पिता ने डाहा गाँव से मलयसिंह आदि को बुला कर देवा-
र्चक स्थापित किया । महणिया नामक मेव ने भगवान के उद्देश्य
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१३० विविध तीर्थ-कल्प
से अपनी अंगुली काट डाली—कि मैं इन भगवान् का अंगुली
काटा सेवक हूँ। भगवान के विलेपन चन्दन लगने से उसके फिर
नई अगुली हो गई।
भगवान को अतिशयवान् सुन कर मालवपति श्री जयसिंह ने
अत्यन्त भक्तिपूर्ण अन्त करण से स्वयं भगवान् अभिनन्दनस्वामी
की पूजा की। देवपूजा के निमित्त मठपति को चौबीस हल की
कृषि-भूमि प्रदान की। अवन्तीपति ने देवार्चक को भी बारह हल
की भूमि दी। आज भी अभिनन्दनभगवान का प्रभाव दिग्मण्डल
मे व्याप्त है और उसी प्रकार पूजे जाते हैं।
अभिनन्दनदेव का यह कल्प जैसा सुना, सक्षेप से श्रीजिन-
प्रभ सूरि ने रचा है।
इसकी ग्रन्थ सख्या ५३ और १८ अक्षर ऊपर है !
३३. प्रतिष्ठानपुर-कल्प
श्री मुनि सुव्रत जिन को नमस्कार कर पृथ्वी मे प्रतिष्ठा प्राप्त
प्रतिष्ठानपुर का कल्प यथाश्रुत कहता हूँ। इसी भारत वर्ष मे
दक्षिण खण्ड महाराष्ट्र देशावतश श्रीमतप्रतिष्ठान नामक पत्तन है।
वह अपनी समृद्धि से इन्द्रपुरी को लज्जित करने वाला नगर भी
कालान्तर मे एक छोटा-सा ग्राम प्राय रह गया। एक बार वहाँ
दो विदेशी ब्राह्मण अपनी विधवा वहिन के साथ आकर किसी
प्रतिष्ठानपुर-कल्प १३१
कुंभार की शाला में रहे। वे कणवृत्ति करके कण लाकर अपनी
बहिन को देते और उससे की हुई रसोई से आहार कर अपना
समय निकालते थे। एक दिन वह ब्राह्मणो की बहिन पानी लाने
के लिए गोदावरी नदी गई। उसके अद्वितीय रूप को देख कर
कामातुर अन्तर्ह्रद निवासी शेष नामक नागराज ने ह्रद से निकल
कर मनुष्य देह धारण कर उसके साथ सभोग-केलि की। उसके मप्त-
धातुरहित होने पर भी भवितव्यतावश दिव्य शक्ति से शुक्र पुद्गल
सचार द्वारा गर्भाधान हो गया। नागराज अपना नाम प्रकाशित
कर—सकट के समय मुझे स्मरण करना—ऐसा कह कर पाताल
लोक चला गया। वह भी अपने घर लौट आई पर उसने अपने
भ्राताओ को लज्जावश अपना वृत्तान्त नही बतलाया। कालक्रम
से उस पेट वाली के गर्भलिंग देख कर दोनो भ्राताओ ने जाना
कि यह गर्भवती हो गई मालूम देती है। बडे भाई के मन मे ऐसी
शका हो गई कि यह अवश्य ही छोटे भाई से उपभुक्त हुई है। वडे
भाई के शकाशील भावो से छोटे के चित्त मे भी विकल्प हुआ कि
यह अवश्य वडे के साथ शीलभ्रष्ट हुई है। इस प्रकार परस्पर
कलुषित आशय से वे दोनो उसे छोड कर अलग-अलग देशान्तर
चले गए।
इधर वह बढते हुए गर्भ वाली बहिन भी पराये घरो मे काम
करके अपनी उदरपूर्त्ति करने लगी। क्रमश पूरे दिन होने से उसने
सर्व लक्षणो से युक्त पुत्र को जन्म दिया। और वह क्रमश शरीर
एव गुणो मे बढते हुए समवयस्क बालको के साथ खेला करता।
वह उन्हे बाल-क्रीडा मे हाथी-घोडा-रथ आदि कृत्रिम नाम देकर
वाहन बनाता और स्वय राजा बन जाता। वाहनो का नाम देने
के कारण लोगो से उसने "सातवाहन" नाम पाया। अपनी जननी
द्वारा पालन होते हुए वह सुख से रहने लगा।
इधर उज्जैन मे अवन्तीपति श्री विक्रमादित्य की सभा में
१३२ विविध तीर्थ-कल्प
किसी नैमित्तिक ने "सातवाहन प्रतिष्ठानपुर मे होने वाला राजा
है" बतलाया । अब उसी नगर मे एक वृद्ध ब्राह्मण ने अपना आयु-
शेष ज्ञात कर अपने चारो पुत्रो को बुला कर कहा कि—वत्स !
मेरे परलोक जाने पर, मेरी शय्या के सिरहाने के दक्षिण पाये से
लेकर चारो ही पायो के नीचे चार निधि-कलग वर्त्तमान हैं, उन्हे
ज्येष्ठ-क्रमानुसार विभाग करके ले लेना जिसमे तुम लोगो का
निर्वाह सपन्न होगा। पुत्रो ने पिता का यह आदेश स्वीकार कर
लिया और मृत्यु होने पर पिता का ऊर्ध्वदैहिक करके तेरहवे दिन
भूमि खनन कर अपने-अपने निधिकलग चारो ने ले लिये । उन्होने
ज्योही उद्घाटित कर देखा तो पहले कलग मे सोना, दूसरे मे
काली मिट्टी, तीसरे के बुश-भूसी और चौथे के कलग मे हड्डियाँ
देखी। तब वे तीनो भाई बडे के साथ विवाद करते हुए कहने लगे
कि हमे भी सोने की पाती बाँट कर दो । उसके वितरण न करने
पर वे अवन्तीपति के न्यायालय मे उपस्थित हुए । वहाँ भी उनके
विवाद का निपटारा नही हुआ तो वे चारो भाई महाराष्ट्र जनपद
मे गए ।
कुमार सातवाहन कुलालशाला मे मिट्टी के हाथी, घोडे, रथ,
सैनिक आदि नये-नये खिलौने बना कर दुर्ललित बालक्रीडा करता
हुआ काल-निर्गमन करता था। वे चारो ब्राह्मणपुत्र भी प्रतिष्ठान-
पत्तन आकर उसी कुलाल चक्रशाला मे ठहरे । उन्हे देख कर
इगिताकारकुशल सातवाहनकुमार ने कहा—अहो ब्राह्मणो !
आप चिन्तातुर दिखायी देते हो। उन्होने कहा—सुभग ! हमारे
मन के अन्दर चिन्ता है, पर आपने कैसे जाना ? कुमार ने कहा—
इगित से क्या नही जाना जा सकता है ? उन्होने कहा—ठीक है,
परन्तु आपके सामने चिन्ता का कारण निवेदन करने से क्या
होगा ? आप तो बालक हैं। कुमार ने कहा—बालक भले हूँ, पर
मुझसे भी आपका साध्य सिद्ध होगा, अत चिन्ता का कारण निवे-
दन करें ।
प्रतिष्ठानपुर-कल्प १३३
उसके वचन-वैचित्र्य से हृत-हृदय ब्राह्मणो ने अपना निधि-
निर्णयार्थ मालवेश परिषद मे गमनादि का सारा वृत्तान्त निवेदन
किया । कुमार ने स्मित अधरो से कहा—ब्राह्मणो ! मै आपके
झगडे का निर्णय करूंगा । सावधान होकर सुनो । जिसे स्वर्ण
वाला कलश दिया वह उसी से निवृत्त हो गया, जिसके कलश मे
काली मिट्टी निकली वह क्षेत्र-केदारादि ले, जिसके तुष-भूसी निकला
वह कोठो मे रहा हुआ सभी धान्य स्वीकार करे और जिसके
हड्डियाँ निकली वह घोडे, गाय, भैस, बैल, दास दासी का स्वामी
हो । यही तुम्हारे पिता का आशय है ।
उज्जैन नगर मे उनके वाद-निर्णय की बात फैली, राजा ने
भी उन्हे बुलाकर कहा—क्या आपका वाद-निर्णय हो गया ?
उन्होने कहा—हाँ स्वामिन् ! । राजा द्वारा—“किसने निर्णय
किया ?” पूछने पर उन्होने सातवाहन का सारा स्वरूप सत्य-सत्य
बता दिया ।
राजा ने यह सुन कर सोचा उस बालक का बुद्धि-वैभव भी
अद्भुत है । उसे दैवज्ञ का कथन स्मरण हुआ कि प्रतिष्ठानपुर मे
उसका राज्य होगा अत राजा उसे शत्रु मान कर क्षुब्ध मन से
उसको मारने का उपाय चिरकाल सोचता रहा । शस्त्रादि प्रयोगो
से मारने मे अपयश और क्षात्रधर्म की क्षति सोच कर मालवपति
ने चतुरङ्गिणी सेना सजाई और प्रतिष्ठानपत्तन को जाकर घेर
लिया । यह देख कर त्रस्त ग्राम्यजन सोचने लगे—क्रुद्ध मालवपति
का यह आटोप कोप किस पर हुआ है ? यहाँ न तो कोई राजा
है, न कोई ठाकुर और न कोई वीर या वैसा दुर्ग ही है । उन लोगों
के इस प्रकार की चिन्ता करते समय मालवेश के दूत ने आकर
सातवाहन से कहा—अरे कुमार ! तुम्हारे पर राजा क्रुद्ध है और
कल तुम्हे मारेगा अत तुम्हे युद्धादि उपाय सोचना उचित है !
दूत की बात सुन कर भी वह निर्भयतापूर्वक खेलने मे लगा रहा ।
इसी बीच परमार्थ ज्ञात कर उसके दोनो मामा दुर्विकल्प त्याग
कर पुन प्रतिष्ठान आ गए थे । उन्होने परचक्र देख कर बहिन से
कहा—बहिन । जिसने तुम्हे यह पुत्र दिया है उसे ही स्मरण करो,
ताकि वही इसका सहायक होगा ।
भ्राताओ के कथन से वह भी नागराज के वचनो को स्मरण
कर शिर पर घड़ा लेकर गोदावरी मे नागह्रद पर गई । नहा कर
नागराज की आराधना की । नागराज ने तत्काल प्रत्यक्ष होकर
कहा—ब्राह्मणी ! तुमने हमे किस लिए याद किया ? उसके प्रणाम
करके सारी बात बताने पर शेषराज ने मेरे प्रताप से तुम्हारे पुत्र
का कौन पराभव कर सकता है ?—कहते हुए उसका घड़ा लेकर
ह्रद के अन्दर गया और पीयूष कुण्ड से अमृत का घडा भर कर
उसे ला दिया । उसने कहा—इस अमृत से सातवाहन के बनाये
हुए मिट्टी के घोडे, रथ, हाथ व सैनिक अभिसिंचित करो जिससे
वे सजीव होकर शत्रु सेना को भग्न कर डालेगे । यह पीयूष-घट
ही तुम्हारे पुत्र को प्रतिष्ठानपत्तन के राज्याभिषिक्त करेगा !
अवसर पर मुझे याद करना । इसके वाद नागराज अपने स्थान
चला गया । वह भी अमृतघट को लेकर अपने घर आई और उस
मिट्टी की समृद्ध सेना को सीचा । प्रात काल देवशक्ति से वह सेना
सचेतन होकर शत्रु सेना के सामने जाकर उसके साथ युद्ध करने
लगी ।
सातवाहन की सेना ने मालवपति का बल भग्न कर दिया ।
राजा विक्रमादित्य भी भग कर अवन्ती चला गया । इसके पश्चात्
सानवाहन राज्याभिषिक्त हुआ । प्रतिष्ठानपुर ने अपनी पूर्व विभूति
पुन प्राप्त की । वहाँ हाट, हवेली, मन्दिर, राजमार्ग, खाई, प्राकार
आदि से सुशोभित सुन्दर पत्तन हो गया । सातवाहन ने भी क्रमश
दक्षिणापथ को तापी तट पर्यन्त अनृण करके उत्तरापथ को साध
प्रतिष्ठानपुराधिपति सातवाहन नृप-चारित्र १३५
कर अपना सवत्सर प्रवर्त्तित किया। वह जैन हुआ, उसने जन-
नयनशीतलकारी जिन-चैत्य बनवाये। पचास वीरो ने भी प्रत्येक
ने अपने अपने नामाङ्कित जिनालय नगर मे कराये।
प्रतिष्ठानपत्तन कल्प समाप्त हुआ, इसकी श्लोक सख्या ४७ है।
३४. प्रतिष्ठानपुराधिपति सातवाहन
नृप चरित्र
अब प्रसङ्गवश अन्य दर्शनियो के सिद्धातो मे लोकप्रसिद्ध
सातवाहन का शेष चरित्र भी कुछ कहते हैं। श्री सातवाहन जब
पृथ्वी का पालन कर रहे थे उस समय प्रतिष्ठाननगर मे पचास
वीर और बाहर भी पचास वीर निवास करते थे। इधर इसी नगर
मे एक ब्राह्मण का शूद्रक नामक अभिमानी पुत्र था, वह भी दर्प
पूर्वक युद्ध-श्रम करता रहता था जो पिता द्वारा अपने कुल के
लिये अनुचित बतलाकर निषेध करने पर भी नही मानता था।
एक दिन पिता के साथ जाते हुए बारह वर्षीय शूद्रक ने देखा
राजा सातवाहन नगर मे रहने वाले वापला, खूदला आदि पचास
वीरो के साथ व्यायाम करते हुए बावन हाथ प्रमाण वाली शिला
को उठा रहे थे। किसी वीर ने चार अगुल, किसी ने छ अगुल
और किसी ने आठ अंगुल भूमि से शिला को ऊँची उठाया। राजा
ने जानु तक ऊँचा उठा लिया। यह देखकर बल जागृत होने मे
१३६ विविध तीर्थ-कल्प
शूद्रक बोला—अहो ! क्या आप लोगो मे से कोई इस शिला को
मस्तक तक नही उठा सकता ? उन लोगो ने ईर्ष्यापूर्वक कहा—
यदि अपने को समर्थ मानते हो तो तुम्ही उठाओ। यह सुनकर
शूद्रक ने उस शिला को आकाश मे उछाला जो दूर तक ऊँची
चली गई। शूद्रक ने कहा—आप लोगो मे जो समर्थ हो वह इस
गिरती हुई शिला को रोक ले ! सातवाहनादि वीरो ने भयाक्रान्त
नेत्रो से उसी से अनुनयपूर्वक कहा—अहो महाबली ! हमारे प्राणो
की रक्षा करो ! रक्षा करो ! शूद्रक ने उस गिरती हुई शिला को
मुष्टिप्रहार किया जिससे उसके तीन टुकडे हो गए। उनमे एक
टुकडा तीन योजन पर जाकर गिरा, दूसरा टुकडा नागहृद मे
और तीसरा टुकडा प्रतोली द्वार के चौरस्ते पर जाकर गिरा जो
आज भी वैसे ही लोगो द्वारा देखा जाता है।
शूद्रक के बल से चमत्कृत होकर राजा ने उसे अत्यन्त सम्मान-
पूर्वक नगर का आरक्षक नियुक्त कर दिया। अन्य शस्त्रास्त्रो का
प्रतिषेध कर उस दण्ड धारण करने वाले का दण्ड हो आयुध बना।
वह शूद्रक भी वाहर रहने वाले वीरो को अनर्थ निवारण करने के
उद्देश्य से नगर मे प्रविष्ट नही होने देता था।
एक वार अपने महल के छत पर सोया हुआ राजा सातवाहन
शरीर-चिन्ता के लिए उठा। उसने नगर के वाह्य भाग मे करुण
रुदन सुना तो पराये दुख से दुखी हृदय से वह तलवार लेकर घर
से निकल पडा। रास्ते मे शूद्रक ने देखा और विनयपूर्वक नमस्कार
कर अर्द्धमहानिशा मे निकल पडने का कारण पूछा। राजा बोले—
यह नगर के समीप करुण क्रन्दन की ध्वनि सुनाई दे रही है इसका
कारण जानने के लिए मैं जा रहा हूँ। राजा के ऐसा कहने पर
शूद्रक ने निवेदन किया—देव ! आप प्रतीक्षा करते हुए भवन को
अलंकृत करने पधारिये, मैं ही उसकी खोज कर आऊँगा। ऐसा
कह कर राजा को लौटा दिया और स्वय गगन-ध्वनि के अनुसार
प्रतिष्ठानपुराधिपति सातवाहन नृप-चरित्र १३७
नगर के बाहर जाने लगा । आगे कान लगाकर चलते हुए उसने
सुना कि कोई गोदावरी के स्रोत मे रो रहा है । शूद्रक परि-
करबद्ध होकर तिरता हुआ ज्योही नदी के बीच मे पहुँचा, त्योही
प्रवाह मे बहते हुए और रोते हुए एक पुरुष को देखकर वह
बोला—अरे ! तुम कौन हो ? किस लिए रो रहे हो ? यह सुनकर
वह और भी ज़ोर-ज़ोर से रुदन करने लगा । अत्यन्त आग्रह से
पूछने पर वह स्पष्ट बोला—हे साहसिकशिरोमणि ! मुझे यहाँ से
निकाल कर राजा के समीप ले चलो, जिससे मै वहाँ अपना
वृत्तान्त कहूँ ।
उसके ऐसा कहने पर शूद्रक ने उसे उठाने का प्रयत्न किया
किन्तु वह उठ न सका । शूद्रक ने सोचा—कही नीचे से किसी
राक्षस ने न पकड-रखा हो । इस आशंका से उसने तलवार चलाई
तब मात्र शिर को वह ऊचा उठा पाया । हाथ मे आया हुआ शिर
छोटा सा था और उसमे से रुधिर झर रहा था । उसे देख कर
शूद्रक विषादपूर्ण होकर सोचने लगा—अहो ! प्रहार न करने वाले
पर भी प्रहार करने वाले मुझको धिक्कार है, मै शरणागत का
घातक हूँ । इस प्रकार आत्मनिन्दा करता हुआ वह वज्राहत के
समान क्षण भर के लिए मूर्छित हो गया । तत्पश्चात् चेतना आने
पर वह चिरकाल चिन्ता करने लगा कि मै अपनी इस दुश्चेष्टा को
को राजा से कैसे निवेदन करूंगा । इस प्रकार लज्जित मन से
वही काष्ठ की चिता बना कर उसमे अग्नि प्रज्वलित कर ज्यो ही
मस्तक को लेकर प्रवेश करने लगा, त्यो ही मस्तक ने कहा—हे
महापुरुष ! ये साहस आप क्यो कर रहे हैं। मैं तो राहु के समान
शिरमात्र ही हूँ ! अत वृथा खेद मत करो । और कृपा कर मुझे
राजा के पास ले चलो । उसकी यह बात सुन चमत्कृत चित्त मे—
यह प्राणी है—ऐसा मानता हुआ प्रसन्नता से शूद्रक उस शिर को
रेशमी कपडे मे लपेट कर प्रात काल सातवाहन राजा के पास
१३८ विविध तीर्थ-कल्प
पहुँचा । नमस्कार किया । राजा ने पूछा—शूद्रक ! यह क्या है ?
वह बोला—देव ! यह वही है जिसकी रुदन-ध्वनि श्रीमान् ने
रात्रि मे सुनी थी । फिर उसने उसका सारा वृतान्त निवेदन कर
दिया ।
राजा ने उस मस्तक से पूछा—अहो ! तुम कौन हो ? किस
लिए यहाँ आना हुआ ? मस्तक ने कहा—महाराज ! आपकी
कीर्ति दोनो कानो से सुन कर करुण रुदन के छल से अपने को
जतला कर मैं आपके पास आया हूँ । आपके दर्शन किए, आज मेरे
उभय नेत्र कृतार्थ हुए ! राजा ने पूछा—तुम कौनसी कला ठीक
ढंग से जानते हो ? उसने कहा—देव ! मैं संगीत कला जानता हूँ !
फिर राजा की आज्ञा से पहले नही गाया हुआ गीत गाने लगा !
उसकी गायन-कला से सारी राजसभा मोहित हो गई । वास्तव मे
वह मायासुर नाम का असुर था और वैसी माया बना कर राजा
की रानी, जो अत्यन्त रूपवती थी उसका हरण करने के लिए
आया हुआ था । पर यह किसी को पता नही लगा । लोगो ने तो
शिरमात्र देखने से उसका नाम प्राकृत—लोक भाषा मे सीपुला रख
दिया । तब से प्रतिदिन उस तुम्बुरु के द्वारा मधुरतर गाते रहने
पर उसका सारा स्वरूप महादेवी ने सुना और दासी के द्वारा
राजा को निवेदन कर उस शिर को अपने पास मगवाया ।
रानी प्रतिदिन उससे संगीत सुनने लगी ।
कुछ दिन बाद मायासुर ने अवसर पाकर रानी का अपहरण
कर लिया और अपने घण्टावलम्बी नामक विमान मे उसे चढा
लिया । रानी करुण क्रन्दन करने लगी—हाय, मेरा किसी ने अप-
हरण कर लिया, पृथ्वी पर क्या कोई ऐसा वीर है जो मुझे छुडा
ले ! खुहला वीर ने रानी की यह पुकार सुन कर दौडते हुए
आकाश मे उछल कर उस विमान का घटा अपने हाथ से दृढता
प्रतिष्ठानपुराधिपति सातवाहन नृप-चरित्र १३९
पूर्वक पकड़ लिया । उसके साहस से विमान स्तब्ध हो गया और
आगे नही चला । मायासुर ने सोचा—यह विमान आगे क्यो नही
चल रहा है । फिर ज्यो ही हाथ मे घट को पकडे उस वीर को
देखा, तो उसका हाथ काट डाला । वीर पृथ्वी पर गिर पड़ा और
विमान को असुर आगे ले चला ।
देवी के अपहरण-वृत्तान्त को राजा ने सुना और ४९ वीरो
को आदेश दिया कि यह देवी का किसने अपहरण किया है, खोज
करिए । वे लोग पहिले से ही शूद्रक से असूया रखते थे अत-
मौका पाकर बोले—महाराज ! शूद्रक ही जाने, वही उस
शिर को लाया था जिसने देवी का अपहरण कर लिया । राजा ने
शूद्रक पर कुपित होकर उसे शूली पर चढाने की आज्ञा दी ।
तत्कालीन देशरीति के अनुसार शूद्रक पर रक्त चन्दन का
लेप किया गया और उसे शकट मे सुलाकर गाढा बाँध कर शूली
पर चढाने के लिए ज्यो ही राजपुरुष चले त्यो ही ४९ वीर एकत्र
होकर शूद्रक से कहने लगे—हे महावीर ! आप रण्डा के समान
किस लिए मर रहे हो ? “अशुभस्य कालहरणम्” न्याय से राजा
से कुछ दिन की अवधि माँगो और देवी का अपहरण करने वाले
की सर्वत्र खोज करो । निष्कारण ही क्यो अपने वीरत्व की कीर्त्ति
को नष्ट कर रहे हो ! उसने कहा—तब राजा के पास जाकर यह
बात निवेदन करिए ! उन्होने वैसा ही किया । राजा ने शूद्रक को
वापस बुलाया । उसने भी अपने मुख से निवेदन किया—महाराज
अवधि दीजिए, जिससे मैं प्रत्येक दिशा मे देवी का अपहरण करने
वाले की खोज करूँ । राजा ने उसे दस दिन की अवधि दी ।
शूद्रक के घर उसके दो सहचारी कुत्ते थे । राजा ने कहा—तुम
दोनो कुत्तो को जमानत स्वरूप हमारे पास रख दो और स्वय देवी
के अनुसंधानार्थ पृथ्वी पर भ्रमण करो । वह वीर भी आदेश प्रमाण
है । कह कर रवाना हो गया ।
१४० विविध तीर्थ-कल्प
राजा ने साकल से बँधे हुए उन दोनो कुत्तो को अपनी शय्या
के पायो से बाँध दिया। गूद्रक को चारो ओर पर्यटन करते हुए भी
कही उसे देवी की वार्ता तक नही मिली तो उसने सोचा—"मेग
यह अपयश प्रगट हुआ है, मैं स्वामी-द्रोही गिना जाऊँगा और
लोग कहेगे कि देवी का इसी ने अपहरण करवा दिया। जब कही
भी उसका पता नही लग रहा है तो मुझे अब मरण का ही शरण
हो।" इस विचार से उसने काष्ठ को चिता बनाई और उसमे
अग्नि प्रज्वलित कर ज्यो ही प्रवेश करने लगा त्यो ही देवाधिष्ठित
कुत्तो ने जाना कि हमारा स्वामी निधन को प्राप्त हो रहा है। वे
दोनो दैव-शक्ति से साकले तोडकर अविलम्ब वहाँ जा पहुँचे जहाँ
गूद्रक ने चिता बनाई थी। उन्होने दाँतो से केशो को पकड कर
गूद्रक को चिता से बाहर निकाल लिया। उसने भी अकस्मात् उन
कुत्तो को देखकर विस्मित मन से कहा—अरे पापियो ! अशुभ के
समान आपने यह क्या किया ? राजा के मन का विश्वास नष्ट
हो जायगा और जानेगा कि जामिनो को भी वह अपने साथ ले
गया। दोनो कुत्ते बोले—धैर्य रखिये और हमारी दिखायी हुई
दिशा मे चलिये। जल्दो मत करिये। ऐसा कह कर वे आगे हो
गए। वह भी उनके साथ चला और क्रमश कोल्लागपुर पहुँचे।
वहाँ के महालक्ष्मी देवी के मन्दिर मे प्रवेश किया गूद्रक ने देवी
को पूजा कर कुगासन अर दैठे हुए तीन उपवास किए। भगवती
महालक्ष्मी प्रत्यक्ष होकर बोली—वत्स ! क्या खोज रहे हो। गूद्रक
ने कहा—भगवती ! सातवाहन राजा की महिषी का पता बतला-
डये, वह कहाँ है। किसने अपहरण किया है। श्री देवी ने कहा—
सब यक्ष-राक्षस-भूत आदि देव गणो को एकत्र कर यह बात मैं
तुम्हे बतलाऊँगी। किन्तु उन सब के लिए तुम्हे वलि-उपहार आदि
एकत्र कर रखना चाहिए। जब तक वे वलि-पूजा ग्रहण कर प्रसन्न
न बने तब तक तुम विघ्नो की रक्षा करते रहना।
प्रतिष्ठानपुराधिपति सातवाहननृप-चरित्र १४१
शूद्रक ने उन देवताओ का तर्पण करने के लिए कुण्ड बना कर
हवन करना प्रारभ-किया । सब देवता गण आये और अभिमुख
हो अपना-अपना भाग ग्रहण किया। ज्यो ही होम का धुँआ फैला,
जहाँ मायासुर था उसने भी लक्ष्मी के आदेग से शूद्रक द्वारा किये
गए होम का स्वरूप जाना और अपने भाई कोल्लासुर को होम मे
विघ्न करने के लिए भेजा। कोल्लासुर अपनी सना सहित आकाश
मे आ गया, सभी देवताओ ने आश्चर्यपूर्वक उसे देखा। वे दोनो
कुत्ते दिव्य गक्ति से उन दैत्यो के साथ युद्ध करने लगे दैत्यो ने
उन्हे मार दिया तब शूद्रक स्वय युद्ध करने लगा। उसके पास दण्ड
के अतिरिक्त दूसरा गस्त्र न होने पर भी मात्र दण्ड से ही उसने
बहुत से असुरो को मार डाला। दैत्यो ने उसकी दक्षिण भुजा काट
डाली तो वह वाम भुजा से ही दण्ड-युद्ध करने लगा। वाम भुजा
के कट जाने से दक्षिण पाँव मे दण्ड धारण कर वह युद्ध करने
लगा। दैत्यो द्वारा उसे भी काट दिए जाने पर बाँये पाँव से दण्ड
युद्ध किया तो असुरो ने उसे भी काट डाला। शूद्रक अपने दाँतो
मे दण्ड पकड कर जब युद्ध करने लगा तो दैत्यो ने उसका मस्तक
भी काट दिया।
अब आकण्ठ तृस देव गणो ने शूद्रक का मस्तक भूमि पर पडा
देख कर कहा—अहो ! अद्भुत भोग देने वाले इस विचारे का यह
क्या हुआ ? इस प्रकार सन्ताप करते हुए वे भी लडने लगे और
कोल्लासुर को मार गिराया। श्री देवी ने अमृत-सिंचन कर शूद्रक
को पूर्णाङ्ग बना दिया और जीवित कर दिया। देवी ने दोनो कुत्तो
को भी जीवित कर प्रसन्नतापूर्वक उसे खङ्गरत्न दिया और
कहा—इससे अजय रहोगे। ऐसा वर दिया।
इसके बाद शूद्रक महालक्ष्मी आदि देवताओ के साथ राजा
नातवाहन की रानी को खोजने के लिए सारे भूमण्डल मे घूमता
हुआ महार्णव मे पहुँचा। वहाँ एक ऊँचा वटवृक्ष देखकर विश्राम
१४२ विविध तीर्थ-कल्प
के लिए उस पर चढ गया। वहाँ उसने पेड की शाखा पर लटकते
हुए नीचा शिर किए हुए काष्ठ की कील मे ऊँचे पाँव रहे हुए
पुरुष को देखा। वह जिह्वा फैलाकर पानी मे रहे हुए जलचर
जीवो को भक्षण कर रहा था, यह उन सभी ने देखा। गूद्रक ने
उससे पूछा—तुम कौन हो ? इस प्रकार क्यो लटक रहे हो ? उसने
कहा—मैं मायामुर का छोटा भाई हूँ। मेरा वडा भाई कामोन्मादी
है, उसने रावण की भाँति सीता जैसी सातवाहन की महिषी को
रमण करने की इच्छा मे हरण कर लिया है। वह पतिव्रता है,
उसे विल्कुल नही चाहती। मैने भाई से कहा—आपको परदारा
का अपहरण करना योग्य नही है क्योकि अपने विक्रम से सारे
ससार को आक्रान्त करने वाला रावण भी परस्त्रीरमण की
इच्छा से कुलक्षय को प्राप्त हुआ था। मेरे इस प्रकार कहने पर
मायामुर क्रुद्ध हो गया और मुझे इस वट की शाखा मे टगाकर
इस प्रकार विडम्बित किया है। मैं जिह्वा फैला कर समुद्र मे चलने
वाले जलचरादि का भक्षण कर जीवन धारण कर रहा हूँ। यह
सुन कर शूद्रक ने कहा—मैं भी उन्ही राजा सातवाहन का गूद्रक
नामक सेवक हू। और उसी देवी की शोध के लिए आया हू। उस
असुर ने कहा—यदि ऐसा है तो मुझे छुडाओ। जिससे मैं तुम्हारे
साथ चल कर उस देवी को दिखाऊँ। मायामुर ने अपने स्थान के
चारो ओर लाक्षा का दुर्ग बना रखा है वह निरन्तर प्रज्वलित
रहता है अत उसे उल्लघन कर अन्दर जाकर उसे मार कर देवी
को लौटाना है।
यह सुनकर शूद्रक ने उसके काष्ठ-बन्धन काट डाले और
उसके पीछे-पीछे देवताओ से घिरे हुए प्रस्थान कर दुर्गोल्लघन
पूर्वक उस स्थान मे जा पहुँचा। मायामुर देवगणो को देख कर
अपनी सेना को साथ लेकर उनसे युद्ध करने लगा। सेना के मर
जाने से वह स्वयं मैदान मे उतर पडा, गूद्रक ने क्रमश उस
प्रतिष्ठानपुराधिपति सातवाहननृप-चरित्र १४३
तलवार के द्वारा मायासुर को मार डाला । और उस घटावलवी
विमान मे देवी को चढा कर सब देवगण शीघ्र ही प्रतिष्ठानपुर की
ओर प्रस्थान कर गए ।
इधर दग दिन की अवधि पूर्ण होते जानकर राजा विचारने
लगा—न तो मेरी महादेवी आई और न गूद्रक वीर और न वे दोनो
कुत्ते ही वापस लौटे । यह सब विनागलीला मुझ कुबुद्धि ने ही
करवायी । इस प्रकार चिन्ता करते हुए सपरिवार प्राणत्याग की
इच्छा से नगर के वाहर उसने चन्दनादिकाष्ठ से चिता तैयार कर-
वायी । ज्योही वह परिजनसमूह को चिता मे डालने लगा त्योही
देवगणो मे से एक वधाई देने वाला वहाँ आ पहुचा और विनय-
पूर्वक राजा से निवेदन किया—देव ! महादेवी के आगमन से
भाग्यशाली हैं ! देव की इस कर्णमनोहर वात को सुन आनद कद
कलित चित्त से राजा ने ज्यो ही ऊँचा देखा—आकाग मे देव-
समूह और गूद्रक दिखलाई पडे । गूद्रक और महादेवी विमान से
उतर कर राजा के चरणो मे गिर पडे । गातवाहन राजा ने
आनन्दसहित गूद्रक का अभिनन्दन करते हुए उसे अर्द्ध राज्य
दिया । राजा, महादेवी के साथ गूद्रक का चारु चरित सुनता
हुआ उत्सवपूर्वक नगर मे प्रविष्ट हो राज्य-लक्ष्मी भोगने लगा ।
इस प्रकार हाल राजा के भाँति-भाँति के अवदान हैं, कितनो
का वर्णन किया जा सकता है ? इसी ने गोदावरी नदी के किनारे
महालक्ष्मी को स्थापित किया और प्रासाद मे उन उन स्थानो मे
अन्यान्य देवता भी यथायोग्य स्थापित किये । इस प्रकार राजा
चिरकाल तक विगाल राज्य का उपभोग करता रहा ।
नगर की वणिक-वीथी मे कोई काष्ठभारवाहक प्रतिदिन
अच्छी लकडियाँ लाकर बेचा करता था । किसी दिन वह भार
बेचने नही आया । वणिक ने उसकी वहिन से पूछा-आज तुम्हारा
१४४ विविध तीर्थ-कल्प
भाई गली मे क्यो नही आया ? उसने कहा--श्रेष्ठिवर ! मेरा भाई
देवताओ मे रहता है। वणिक ने कहा—यह कैसे ? वह बोली—
ककण बँधने से लेकर विवाह-प्रकरण तक चार दिन मनुष्य अपने
आपको देवताओ के बीच वसता हुआ मानता है, वैसे वैसे उत्सव
देखने के कुतुहल से वैसा अनुभव करता है। यह वात राजा तक
पहुँची, राजा ने विचार किया—अहो ! क्या मै देवताओ मे नही
रहता ? मैं भी चार दिनो के अनवरत विवाहोत्सवमय देवस्वरूप
रहूगा । यह सोचकर चार वर्णो मे जिन-जिन कन्याओ को युवती
या रूपवती देखता सुनता, उन्ही को उत्सवपूर्वक विवाह लाता
था।
इस प्रकार बहुत सा समय बीत जाने पर लोगो ने विचार
किया—क्या भविष्य मे सभी वर्ण वाले लोग नि सन्तान ही रहेगे ?
सब कन्याओ के साथ तो राजा ही विवाह कर लेता है। स्त्री के
विना सन्तान कहाँ से होगी ? इस प्रकार लोगो के दुखी होने पर
‘विवाह वाटिका' नामक गाँव मे रहने वाले एक ब्राह्मण ने पीठजा
देवी का आराधना करके निवेदन किया-- भगवती ! हमारे सतानो
का विवाह कैसे होगा ? देवी ने कहा—ब्राह्मण ! मैं तुम्हारे घर मे
कन्या के रूप मे अवतार लूगी। जब मेरे लिए राजा प्रार्थना करे
तो मुझे राजा को दे देना, शेष मैं सब संभाल लूंगी ! वैसा ही
हुआ । राजा ने उसे रूपवती सुनकर विप्र से याचना की। वह भी
बोला—मैंने कन्या दी, किन्तु महाराज वही पधार कर मेरी कन्या
के साथ विवाह करे ! राजा ने स्वीकार कर लिया। ज्योतिषी के
दिए हुए लग्न मे राजा विवाह करने के लिए चला और उस गाँव
श्वसुर के घर पहुँचा। देशाचार के कारण वर और वधू के बीच
मे पडदा डाल दिया गया। अजलि मे खील (लाजा, जँवार की
फूली) भर कर ज्यो ही दोनो पडदा हटा कर एक दूसरे के
प्रतिष्ठानपुराधिपति सातवाहननृप-चरित्र १४५
गिर पर लाजा विखेरने लगे। फिर हथलेवा होने वाला ही था,
राजा ने उसकी ओर देखा त्यो ही वह भयङ्कर रूप वाली राक्षसी
सी दिखाई पडी। और वह लाजा (जंवार 'की फूली) खीले भी
कठोर पाषाण के कंकड के समान शिर मे लगने लगी। राजा ने
भी—यह क्या आफत है—विचार करते हुए वहाँ से पलायन कर
दिया। वह भी पीछे लगी हुई पत्थर के टुकडे बरसाती हुई चलने
लगी। राजा वहाँ से दौडता हुआ अपनी जन्म-भूमि नाग-ह्रद मे
प्रविष्ट हुआ और वही पर मर गया। आज भो वह पीठजा देवी
प्रतोली के वाहर अपने मन्दिर मे स्थित है।
शूद्रक भी क्रमग कालिका देवो द्वारा अजारूप वन कर वापी
मे प्रविष्ट हो करुण गब्द से ठगा गया। वह उसे निकालने के
लिए वापो मे गया और द्वार पर उस तलवार के तिरछी गिर
जाने से छिन्नाङ्ग होकर पञ्चत्व प्राप्त हो गया, क्योकि महालक्ष्मी
ने वर देते समय “इसी तलवार से तुम्हारा अन्त होगा” कह
दिया था।
राजा सातवाहन के स्थान पर गक्तिकुमार का राज्याभिषेक
हुआ, तव-से लेकर आज तक कोई राजा प्रतिष्ठान—वीर क्षेत्र मे
प्रवेग नही करता।
यहाँ जो कुछ असंभव बातें हैं वे अन्य दर्शन मे कही गई है।
इस प्रकार की असंगत बातें जो हेतु से सिद्ध नही होती, उन्हे जैन
नही मानते।
यह प्रतिष्ठान-कल्प और प्रसगवश संक्षिप्त सातवाहन-चरित्र
श्रीजिनप्रभसूरि ने वनाया। इसकी ग्रन्थ सख्या १६६ और ९
अक्षर ऊपर है।
१०
३५. चम्पापुरी-कल्प
दुर्नीति को भग करने वाले अंग देग जनपद के भूषणरुप
प्रधान तीर्थ चम्पापुरी का कल्प कहता हूँ । यहाँ त्रिभुवन-पूज्य
बारहवे तीर्थङ्कर श्री वासुपूज्य जिनेश्वर के गर्भावतरण-च्यवन,
जन्म, प्रव्रज्या, केवलज्ञान और निर्वाण रुप पाँच कल्याणक
हुए हैं ।
यही श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र के पुत्र मघव राजा की पुत्री लक्ष्मी
की कुक्षी से आठ पुत्रो के ऊपर रोहिणी नामक पुत्री उत्पन्न हुई ।
उसने स्वयवर मे अशोक राजा के कण्ठ मे वरमाला डाली और
उसके साथ विवाह कर पट्टरानी हुई । क्रमशः उसके आठ पुत्र और
चार पुत्रियाँ हुई । एक दिन श्री वासुपूज्य स्वामी के शिष्य रूप्य-
कुम्भ-स्वर्णकुम्भ के मुख से सुखी होने के हेतु भूतपूर्व जन्म मे किये
हुए रोहिणी तप को सुन कर उद्यापन विधि से आराधना कर
सपरिवार मुक्ति प्रप्त हुई ।
यहाँ भूमण्डल के इन्द्र सहश करकण्डू राजा ने पहिले काद-
म्बरी अटवी मे कलिगिरि की उपत्यका मे रहे हुए कुण्ड नामक
सरोवर मे श्री पार्श्वनाथ भगवान को छद्मस्थावस्था मे विचरते
हुए हस्ति-व्यन्तरानुभाव से कलिकुण्ड तीर्थ रूप से प्रतिष्ठापित
किया था ।
फिर यहाँ सुभद्रा महासती ने तीन विकट पाषाणमय प्रतो-
लियो के वन्द कपाट-सम्पुटो को अपने शील माहात्म्य द्वारा कच्चे
सूत-तन्तु-वेष्टित चलनी से कुएँ का जल निकाल कर उससे
सिंचित कर उद्घाटित किये थे । चारो मे से एक प्रतोली—"मेरे
जैसी अन्य सच्चरित्रा सती हो, उसके उघाडने के लिए वन्द ही
चम्पापुरी-कल्प १४७
छोड देती हूँ"—कह कर राजा आदि लोगो के समक्ष बन्द ही
रहने दी। उस दिन से ले कर चिरकाल पर्यन्त जनता ने उसे
वैसो ही बन्द देखी। क्रमश विक्रम संवत् १३६० मे लक्षणावती
के सुलतान समसदीन ने शकरपुर दुर्ग के उपयोगी पाषाण लेने के
लिए उस प्रतोली को गिरा कर कपाट जोडी को भी ले लिया।
यहाँ के दधिवाहन राजा अपनी रानी पद्मावती के साथ उसका
दोहद पूर्ण करने के लिए हाथी पर आरूढ हो कर अरण्य-विहार
करने गये। हाथी के न रुकने पर अरण्य मे राजा वृक्ष की शाखा
पकड कर उतर गया। हाथी आगे चला गया और राजा अपने
नगर मे आ गया। देवी पद्मावती असमर्थता से उतर न सकी
और उस पर चढी हुई अरण्य मे गई। हथिनी से उतर कर क्रमश
अरण्य मे ही पुत्र-प्रसव किया, वह करकण्डु नामक राजा हुआ।
कलिंग मे पिता के साथ युद्ध करते माता पद्मावती आर्या ने उसे
प्रतिषेध किया। क्रमशः महावृषभ की यौवन, वार्धक्य अवस्था
को देख कर बोधि पा कर करकण्डु प्रत्येकबुद्ध हो कर सिद्धिगति
प्राप्त हुए।
यही दधिवाहन राजा की पुत्री चन्दनबाला ने जन्म लिया,
जिसने भगवान महावीर स्वामी को कौशाम्बी मे सूप के कोने मे
रहे हुए उडद के वाकुले दे कर पाँच दिन कम छ मासोपवास का
पारणा द्रव्य क्षेत्र कालभाव अभिग्रह पूर्ण होने पर कराया।
यहाँ एवं पृष्ठचम्पा मे प्रभु महावीर ने तीन वर्षाकाल विताए,
समवशरण हुए।
इसी के पास श्री श्रेणिक राजा के पुत्र अशोकचन्द्र अपर नाम
कूणिक महाराजा ने पितृशोकवश राजगृह को त्याग कर चम्पक
के चारु पुष्पोसे सुन्दर नवीन राजधानी चम्पा बसाई।
दानवीरो मे दृष्टान्तभूत, पाण्डुकुलमण्डन राजा श्री कर्ण का
१४८ विविध तीर्थ-कल्प
राज्य भी यही था। आज भी शृंगार-चतुरिका आदि उनके
अवदात स्थान इस नगरी मे हैं।
यहाँ सम्यग्दृष्टि सुदर्शन सेठ को दधिवाहन राजा की रानी
अभया ने संभोगार्थ उपसर्ग किये। राजा के वचनो से मारने के
लिए ले जाने पर अपने निर्दोष शील-सम्पत्ति के प्रभाव से आकृष्ट
शासनदेवता के सानिध्य से शूली का स्वर्णमय सिंहासन हो
गया। और तीक्ष्ण तलवार भी सुगन्धित पुष्पमाला हो कर मन
को आनन्ददायी बन गई।
भगवान महावीर का अग्रश्रावक कामदेव भी यही हुआ जो
अठारह करोड स्वर्ण एव दश हजार गायो वाले छह गोकुलो का
स्वामी था। भद्रा का वह पति था। पौषधशाला मे मिथ्यादृष्टि
देव द्वारा पिशाच, हाथी, साँप आदि का रूप करके उपसर्ग करने
पर भी अक्षुब्ध रहा। समवशरण मे भगवान ने स्वय इनकी
प्रशसा की।
यही विचरते हुए चौदह पूर्वधर श्री शय्यंभवसूरि ने राजगृह
से आये हुए अपने मनक नामक पुत्र को दीक्षित करके श्रुतोपयोग
से उसकी छ मास आयु अवशिष्ट ज्ञात कर उसके अध्ययनार्थ
पूर्वो से दशवैकालिक सूत्र की रचना की। उनमे आत्म-प्रवाद से
छज्जीवणिया, कर्म-प्रवाद पूर्व से पिण्डैषणा, सत्य-प्रवाद पूर्व से
वाक्यशुद्धि एव अवशिष्ट अध्ययन प्रत्याख्यान पूर्व की तीसरी
वस्तु से लिए।
यहाँ के निवासी कुमारनन्दी स्वर्णकार ने अपने विभव वैभव
के मद से अभिभूत हो तीव्र ज्वाला मे प्रविष्ट हो पचशैलाधिपत्य
प्राप्त किया। पूर्व भव के मित्र से बोध पा कर गोशीर्षचन्दन-
मय जीवित स्वामी की अलकारविभूषित देवाधिदेव श्री महावीर
स्वामी की प्रतिमा निर्मित की।