विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअवन्ती देशस्थ अभिनन्दनदेव-कल्प १२९
तब उन्होने उन सात या नौ टुकडो को पूर्ववत् यथावस्थित जोड
कर प्रतिमा प्रकट कर दी । वडजा ने प्रतिमा जुडी हुई देखी और
कलुषितहृदय निषाद लोगो का सस्पर्श ही विषादपूर्ण समझ कर
उस सुश्रावक ने सात्विक रीति से अभिग्रह किया कि जब तक मै
इस प्रतिमा को अखण्ड न देखू तब तक अन्न जल नही लूगा !
सेठ को प्रतिदिन उपवास करते देख उस विम्ब-अभिनदन
स्वामी—के अधिष्ठायक देव ने वडजा को स्वप्न मे कहा—इस
प्रतिमा के नवो खण्डो की सन्धि को चन्दन लेप से पूर्ण करो तो
यह अखण्डता प्राप्त करेगी ! प्रात काल मे उस बुद्धिमान ने प्रमोद-
पूर्वक वैसा ही किया । भगवान की देह अखण्ड हो गई, चन्दन के
लेपमात्र से सारी सन्धियाँ मिल गई । उसने तत्काल विशुद्ध श्रद्धा-
पूर्वक भगवान की पूजा करके भोजन किया । और उस वणिक ने
अत्यन्त हर्षपूर्वक मेव लोगो को गुडादि दिया ।
उसके वाद उस वणिक ने रत्न-प्राप्ति की भाँति अत्यन्त प्रस-
न्नतापूर्वक सूने खेडे मे पीपल वृक्ष के नीचे वेदी वधाकर उस
प्रतिमा को मण्डित किया । तब से श्रावकसघ और चारो वर्ण के
लोग चारो दिशाओ से आकर यात्रोत्सवादि आयोजन करने लगे !
वहाँ अभयकीर्त्ति, भानुकीर्त्ति, आवा, राजकुल, मठपति आचार्य
चैत्यचिन्ता—सार-सभाल करते हैं ।
प्राग्वाट वशावतश थेहा का पुत्र हालाशाह नि सन्तान था ।
उसने पुत्र के लिए मानता की—यदि मेरे पुत्र हो गया तो मै यहाँ
मन्दिर वनवाऊंगा ! क्रमश अधिष्ठायक देव के सान्निध्य से उसके
कामदेव नामक पुत्र हुआ । हालाशाह ने वहाँ ऊँचे शिखर वाला
चैत्य वनवाया । क्रमश भावड शाह की पुत्री कामदेव को पर-
णाई । पिता ने डाहा गाँव से मलयसिंह आदि को बुला कर देवा-
र्चक स्थापित किया । महणिया नामक मेव ने भगवान के उद्देश्य
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