विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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किसी नैमित्तिक ने "सातवाहन प्रतिष्ठानपुर मे होने वाला राजा
है" बतलाया । अब उसी नगर मे एक वृद्ध ब्राह्मण ने अपना आयु-
शेष ज्ञात कर अपने चारो पुत्रो को बुला कर कहा कि—वत्स !
मेरे परलोक जाने पर, मेरी शय्या के सिरहाने के दक्षिण पाये से
लेकर चारो ही पायो के नीचे चार निधि-कलग वर्त्तमान हैं, उन्हे
ज्येष्ठ-क्रमानुसार विभाग करके ले लेना जिसमे तुम लोगो का
निर्वाह सपन्न होगा। पुत्रो ने पिता का यह आदेश स्वीकार कर
लिया और मृत्यु होने पर पिता का ऊर्ध्वदैहिक करके तेरहवे दिन
भूमि खनन कर अपने-अपने निधिकलग चारो ने ले लिये । उन्होने
ज्योही उद्घाटित कर देखा तो पहले कलग मे सोना, दूसरे मे
काली मिट्टी, तीसरे के बुश-भूसी और चौथे के कलग मे हड्डियाँ
देखी। तब वे तीनो भाई बडे के साथ विवाद करते हुए कहने लगे
कि हमे भी सोने की पाती बाँट कर दो । उसके वितरण न करने
पर वे अवन्तीपति के न्यायालय मे उपस्थित हुए । वहाँ भी उनके
विवाद का निपटारा नही हुआ तो वे चारो भाई महाराष्ट्र जनपद
मे गए ।
कुमार सातवाहन कुलालशाला मे मिट्टी के हाथी, घोडे, रथ,
सैनिक आदि नये-नये खिलौने बना कर दुर्ललित बालक्रीडा करता
हुआ काल-निर्गमन करता था। वे चारो ब्राह्मणपुत्र भी प्रतिष्ठान-
पत्तन आकर उसी कुलाल चक्रशाला मे ठहरे । उन्हे देख कर
इगिताकारकुशल सातवाहनकुमार ने कहा—अहो ब्राह्मणो !
आप चिन्तातुर दिखायी देते हो। उन्होने कहा—सुभग ! हमारे
मन के अन्दर चिन्ता है, पर आपने कैसे जाना ? कुमार ने कहा—
इगित से क्या नही जाना जा सकता है ? उन्होने कहा—ठीक है,
परन्तु आपके सामने चिन्ता का कारण निवेदन करने से क्या
होगा ? आप तो बालक हैं। कुमार ने कहा—बालक भले हूँ, पर
मुझसे भी आपका साध्य सिद्ध होगा, अत चिन्ता का कारण निवे-
दन करें ।