विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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से अपनी अंगुली काट डाली—कि मैं इन भगवान् का अंगुली
काटा सेवक हूँ। भगवान के विलेपन चन्दन लगने से उसके फिर
नई अगुली हो गई।
भगवान को अतिशयवान् सुन कर मालवपति श्री जयसिंह ने
अत्यन्त भक्तिपूर्ण अन्त करण से स्वयं भगवान् अभिनन्दनस्वामी
की पूजा की। देवपूजा के निमित्त मठपति को चौबीस हल की
कृषि-भूमि प्रदान की। अवन्तीपति ने देवार्चक को भी बारह हल
की भूमि दी। आज भी अभिनन्दनभगवान का प्रभाव दिग्मण्डल
मे व्याप्त है और उसी प्रकार पूजे जाते हैं।
अभिनन्दनदेव का यह कल्प जैसा सुना, सक्षेप से श्रीजिन-
प्रभ सूरि ने रचा है।
इसकी ग्रन्थ सख्या ५३ और १८ अक्षर ऊपर है !
३३. प्रतिष्ठानपुर-कल्प
श्री मुनि सुव्रत जिन को नमस्कार कर पृथ्वी मे प्रतिष्ठा प्राप्त
प्रतिष्ठानपुर का कल्प यथाश्रुत कहता हूँ। इसी भारत वर्ष मे
दक्षिण खण्ड महाराष्ट्र देशावतश श्रीमतप्रतिष्ठान नामक पत्तन है।
वह अपनी समृद्धि से इन्द्रपुरी को लज्जित करने वाला नगर भी
कालान्तर मे एक छोटा-सा ग्राम प्राय रह गया। एक बार वहाँ
दो विदेशी ब्राह्मण अपनी विधवा वहिन के साथ आकर किसी