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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 216

प्रतिष्ठानपुर-कल्प १३३
उसके वचन-वैचित्र्य से हृत-हृदय ब्राह्मणो ने अपना निधि-
निर्णयार्थ मालवेश परिषद मे गमनादि का सारा वृत्तान्त निवेदन
किया । कुमार ने स्मित अधरो से कहा—ब्राह्मणो ! मै आपके
झगडे का निर्णय करूंगा । सावधान होकर सुनो । जिसे स्वर्ण
वाला कलश दिया वह उसी से निवृत्त हो गया, जिसके कलश मे
काली मिट्टी निकली वह क्षेत्र-केदारादि ले, जिसके तुष-भूसी निकला
वह कोठो मे रहा हुआ सभी धान्य स्वीकार करे और जिसके
हड्डियाँ निकली वह घोडे, गाय, भैस, बैल, दास दासी का स्वामी
हो । यही तुम्हारे पिता का आशय है ।
उज्जैन नगर मे उनके वाद-निर्णय की बात फैली, राजा ने
भी उन्हे बुलाकर कहा—क्या आपका वाद-निर्णय हो गया ?
उन्होने कहा—हाँ स्वामिन् ! । राजा द्वारा—“किसने निर्णय
किया ?” पूछने पर उन्होने सातवाहन का सारा स्वरूप सत्य-सत्य
बता दिया ।
राजा ने यह सुन कर सोचा उस बालक का बुद्धि-वैभव भी
अद्भुत है । उसे दैवज्ञ का कथन स्मरण हुआ कि प्रतिष्ठानपुर मे
उसका राज्य होगा अत राजा उसे शत्रु मान कर क्षुब्ध मन से
उसको मारने का उपाय चिरकाल सोचता रहा । शस्त्रादि प्रयोगो
से मारने मे अपयश और क्षात्रधर्म की क्षति सोच कर मालवपति
ने चतुरङ्गिणी सेना सजाई और प्रतिष्ठानपत्तन को जाकर घेर
लिया । यह देख कर त्रस्त ग्राम्यजन सोचने लगे—क्रुद्ध मालवपति
का यह आटोप कोप किस पर हुआ है ? यहाँ न तो कोई राजा
है, न कोई ठाकुर और न कोई वीर या वैसा दुर्ग ही है । उन लोगों
के इस प्रकार की चिन्ता करते समय मालवेश के दूत ने आकर
सातवाहन से कहा—अरे कुमार ! तुम्हारे पर राजा क्रुद्ध है और
कल तुम्हे मारेगा अत तुम्हे युद्धादि उपाय सोचना उचित है !
दूत की बात सुन कर भी वह निर्भयतापूर्वक खेलने मे लगा रहा ।