विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रतिष्ठानपुर-कल्प १३१
कुंभार की शाला में रहे। वे कणवृत्ति करके कण लाकर अपनी
बहिन को देते और उससे की हुई रसोई से आहार कर अपना
समय निकालते थे। एक दिन वह ब्राह्मणो की बहिन पानी लाने
के लिए गोदावरी नदी गई। उसके अद्वितीय रूप को देख कर
कामातुर अन्तर्ह्रद निवासी शेष नामक नागराज ने ह्रद से निकल
कर मनुष्य देह धारण कर उसके साथ सभोग-केलि की। उसके मप्त-
धातुरहित होने पर भी भवितव्यतावश दिव्य शक्ति से शुक्र पुद्गल
सचार द्वारा गर्भाधान हो गया। नागराज अपना नाम प्रकाशित
कर—सकट के समय मुझे स्मरण करना—ऐसा कह कर पाताल
लोक चला गया। वह भी अपने घर लौट आई पर उसने अपने
भ्राताओ को लज्जावश अपना वृत्तान्त नही बतलाया। कालक्रम
से उस पेट वाली के गर्भलिंग देख कर दोनो भ्राताओ ने जाना
कि यह गर्भवती हो गई मालूम देती है। बडे भाई के मन मे ऐसी
शका हो गई कि यह अवश्य ही छोटे भाई से उपभुक्त हुई है। वडे
भाई के शकाशील भावो से छोटे के चित्त मे भी विकल्प हुआ कि
यह अवश्य वडे के साथ शीलभ्रष्ट हुई है। इस प्रकार परस्पर
कलुषित आशय से वे दोनो उसे छोड कर अलग-अलग देशान्तर
चले गए।
इधर वह बढते हुए गर्भ वाली बहिन भी पराये घरो मे काम
करके अपनी उदरपूर्त्ति करने लगी। क्रमश पूरे दिन होने से उसने
सर्व लक्षणो से युक्त पुत्र को जन्म दिया। और वह क्रमश शरीर
एव गुणो मे बढते हुए समवयस्क बालको के साथ खेला करता।
वह उन्हे बाल-क्रीडा मे हाथी-घोडा-रथ आदि कृत्रिम नाम देकर
वाहन बनाता और स्वय राजा बन जाता। वाहनो का नाम देने
के कारण लोगो से उसने "सातवाहन" नाम पाया। अपनी जननी
द्वारा पालन होते हुए वह सुख से रहने लगा।
इधर उज्जैन मे अवन्तीपति श्री विक्रमादित्य की सभा में