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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

नाशिकपुर-कल्प ११९

एक दिन गुक्र महाग्रह की पुत्री देवयानी को जनकस्थानपुर
मे खेलते हुए दण्डक राजा ने देखा । रूपवती होने के कारण वला-
त्कार से उसने उसका शीलभग किया । गुक्र महाग्रह को उसका
स्वरूप ज्ञात होने पर उसने रोषवश शाप दिया कि यह नगर
दण्डक राजा सहित सात दिन के भीतर राख का ढेर हो जायगा ।
नारद ऋषि को यह ज्ञात होने पर उसने दण्डक राजा को कहा ।
दण्डक राजा सुन कर भय के मारे सव लोगो को लेकर चन्द्रप्रभ
स्वामी के शरण में आया और शापमुक्त हुआ । उसके वाद नगर
का नाम “जगथाण” प्रसिद्ध हुआ । इस प्रकार परतीर्थी लोग भी
जिस तीर्थ का माहात्म्य बखानते हैं, तो जैन लोग क्यो नही
वर्णन करेंगे ।
इसके पश्चात् द्वापर वृग मे पाण्डु राजा की पत्नी कुन्ती देवी
ने प्रथम पुत्र युधिष्ठिर होने पर चन्द्रप्रभ स्वामी के प्रासाद को
जीर्ण देखकर उद्धार कराया, अपने हाथ से उसने वहाँ विल्व वृक्ष
रोपा । तब वह कुन्ती-विहार नाम से विख्यात हुआ । फिर द्वैपायन
ऋषि के द्वारा द्वारिका का दाह होने पर उपक्षीणप्राय यादव वंश
मे वज्रकुमार नामक यादव क्षत्रिय था जिसकी स्त्री गर्भवती थी ।
वह द्वारिका-दाह होते समय बहुभक्ति पूर्वक द्वैपायन ऋषि से
छूट कर चन्द्रप्रभ स्वामी के शरण मे आई । पूर्ण समय होने पर
वहाँ उसने पुण्यशाली पुत्र प्रसव किया । उसका नाम दृढप्रहारी
दिया गया । वह वाल्यकाल अतिक्रान्त कर तरुणावस्था मे महा-
रथी हो गया । वह अकेला ही लाख सुभटो के साथ युद्ध करने मे
समर्थ था । एक वार वहाँ चोरो ने गायो का हरण किया, उन सव
को अकेला दृढप्रहारो जीत कर लौटा लाया, इससे उसको अत्यन्त
पराक्रमी ज्ञात कर ब्राह्मण आदि नागरिको ने उसे तलार—नगर-
रक्षक पद दिया । उसने चोर डाकुओ का निग्रह किया और क्रमशः

१२० विविध तीर्थ-कल्प
उसी नगर का महाराजा हो गया । यादव वंश बीज का वहाँ
उद्धार हुआ जिससे उसने बहुमानपूर्वक चन्द्रप्रभ स्वामी के मन्दिर
का उद्धार कराया । इस प्रकार त्रेता युग का उद्धार हुआ, ऐसे
तीनो युगो मे वहाँ अनेक उद्धार हुए ।
वर्त्तमान कलिकाल मे श्री शान्तिसूरि ने उद्धार करवाया ।
पहले कल्याणकटक नगर मे परमर्दी नामक राजा राज्य करता
था । उस जिनेन्द्र भक्त ने वहाँ के प्रासाद मे चन्द्रकान्त मणिमय
विम्व सुनकर विचार किया कि मै इस प्रतिमा को अपने घर लाकर
गृह चैत्यालय मे पूजा करूंगा । नाशिक के नागरिको ने इसका
कथंचित् व्यतिकर जानकर ताम्रसम्पुट मे उस बिम्ब को निक्षिप्त
कर के ऊपर लेप कर दिया, लेपमय प्रतिमा हो गई । राजा ने
जिनालय मे आने पर जब उस प्रतिमा को न देखा तो लोगो से
पूछा । उनके यथास्थित कहने पर राजा ने सोचा—इस लेप को
भेदन कर मूल प्रतिमा को निकालूगा । फिर राजा ने उस मन्दिर
का उद्धार कराने के लिए चौवीस गाँव अर्पण किये । उसके द्रव्य
से देवाधिदेव पूजे जाते हैं ।
इसके बाद कितना ही समय बीतने पर निकटवर्त्ती त्र्यम्बक-
देवाधिष्ठित महादुर्ग ब्रह्मगिरि स्थित महल्लय क्षत्रिय जाति का
वाइओ नामक डाकू था जिसने प्रासाद को गिरा दिया । यह सुन
कर पल्लीवाल-वंशावतंश ईश्वर के पुत्र माणिक्य के जो नाऊ की
कुक्षि-सरोवर के राजहंस सदृश था—उस कुमारसिंह परम श्रावक
ने पुन भव्य प्रासाद करवाया । अपने न्यायोपार्जित द्रव्य को सफल
कर उसने अपने को भवसागर से पार किया ।
इस प्रकार अनेक उद्धार वाले नाशिक महातीर्थ की आज भी
यात्रा-महोत्सव करने के लिए चतुर्दिशाओ से सघ आकर आरा-
धना करता है । वे कलिकाल के दर्प को विनष्ट करने वाले भगवान
के शासन की प्रभावना करते हैं ।

हरिकंखी नगर स्थित पार्श्वनाथ-कल्प १२१

पौराणिक परमतीर्थ नाशिकपुर का यह कल्प है इसे वाचने-
पढने वालो को वांछित ऋद्धि सप्राप्त होती है।
कुछ अन्य दर्शनियो के मुख से कुछ जैन पुरातत्त्वविदो के
मुखँ से श्रवण कर श्री जिनप्रभसूरि ने नाशिकपुर का यह कल्प
लिखा है।
श्री नाशिक्यपुर का कल्प समाप्त हुआ। इसकी श्लोक-सख्या
५९ और २७ अक्षर हैं।


२९. हरिकंखीनगर स्थित पार्श्वनाथ-कल्प

हरिकंखी नगरी के चैत्य मे निविष्ट पार्श्वनाथ स्वामी को
नमस्कार करके कलिकाल के दर्प को नष्ट करने वाला वहाँ का
थोडा कल्प कहता हू।
गुर्जर धरा मे हरिकंखी नामका सुन्दर गाँव है। वहाँ उत्तुंग
शिखर वाले जिनालय मे प्रातिहार्यसन्निहित श्री पार्श्वनाय-प्रतिमा
भव्यजनो द्वारा विविध पूजाओ से त्रिकाल पूजी जाती है। एकवार
चालुक्यवशप्रदीप श्री भीमदेव के राज्य मे तुर्क मण्डल से सबल
सैन्य सहित आये हुए अतनुवुक्का नामक सलार ने अणहिलवाडा
पाटणगढ को भग किया। उसने वहाँ से लौटते हुए हरिकंखी
गाँव के चैत्य को देखा और प्रविष्ट होकर पार्श्वनाथ प्रतिमा को
भग्न कर डाला। उसके पश्चात् गाँव मे उपद्रव करके सलार
स्वस्थान की ओर चला गया।

१२४ विविध तीर्थ-कल्प
उपाश्रय माँगने के लिए आये हैं, जहाँ पर सूरि महाराज सपरि-
वार रह सके ।
उसने कहा - मैने उपाश्रय दिया, सूरि महाराज पधारें और
सुखपूर्वक रहे । पर केवल हम पाप निरतो को धर्मोपदेश न दें ।
साधुओ ने कहा—ऐसा हो होगा ! गुरु महाराज पधारे, वर्षाकाल
चातुर्मास रहे । वे स्वाध्याय करते और छट्ठ-अठ्ठमादि तप द्वारा
अपने शरीर का शोषण करते । क्रमशः वर्षाकाल बीतने पर वह
उन्हे विदा करने लगा और उनके सत्यप्रतिज्ञ गुण से प्रसन्न
होकर अपनी नगर-सीमा तक पहुँचाने के लिए चला । सीमा पर
पहुचने पर सूरिजी ने कहा—मेहर ! तुमने उपाश्रय देकर हमारा
बडा उपकार किया । अब हम आज कुछ धर्मोपदेश देगे, जिसने
प्रत्युपकार हो सके । मेहर ने कहा—मेरे से नियम का निर्वाह तो
नही होगा ! कुछ मन्त्राक्षर उपदेश करें ।
सूरि महाराज ने अनुकम्पा से उसे पच परमेष्ठि नमस्कार
महामन्त्र सिखाया और उसका जल-अग्नि-स्तभनादि प्रभाव भी बत-
लाया । फिर गुरु महाराज ने कहा—प्रतिदिन तुम शत्रुञ्जय की
दिशा मे प्रणाम करना । मेहर उनका कथन स्वीकार करके अपने
घर आ गया । सूरि महाराज अन्यत्र विचरने लगे । वह मेहर
क्रमश उस पञ्च परमेष्ठी मत्र का जाप करते हुए—नियम-निर्वाह
करते हुए काल निर्गमन करने लगा । अन्यदा उसकी पत्नी ने उसे
कलह करके घर से निकाल दिया । वह शत्रुञ्जय गिरिराज के
शिखर पर चढने लगा । जब वह मद्य से भरा पात्र हाथ मे लिए
वटवृक्ष की छाया मे मद्यपान करने के लिए बैठा तो गीध के मुँह
मे रहे हुए साँप के जहर की बूँदें मद्यपात्र मे आकर गिरी । उसने
यह देखकर विरक्त चित्त से मद्य त्याग दिया और ससार से विरक्त
होकर अनशन ग्रहण कर लिया । आदीश्वर भगवान के चरण
कमल एव नवकार मत्र को स्मरण करते हुए वह शुभ ध्यान से

कपर्दि यक्ष-कल्प १२५
कालधर्म प्राप्त हुआ। तीर्थ के माहात्म्य और नवकार मन्त्र के
प्रभाव से वह कवड्डि-(कपर्दि) यक्ष उत्पन्न हुआ। और अवधि ज्ञान
से अपना पूर्व भव देखकर आदीश्वर भगवान की पूजा करने
लगा। यह व्यतिकर सुनकर उसकी गृहिणी वहाँ आई और आत्म-
निन्दा करते हुए अनगनपूर्वक जिनेश्वर का स्मरण कर काल-धर्म
को प्राप्त हुई और उसी यक्ष का वाहन हाथी उत्पन्न हुई। कपर्दि
यक्ष के चारो हाथो मे पाश, अकुग, द्रव्य की थैली और वीजोरा
रहता है।
अवधिज्ञान से वह अपना पूर्वभाव ज्ञात कर महाराज के
चरणो मे आया और हाथ जोड़कर कहा—भगवन् ! आपके
प्रसाद से मैने यह ऋद्धि प्राप्त की है, अब मुझे कुछ कर्त्तव्य का
आदेश करे। गुरु महाराज ने कहा—तुम इसी तीर्थ पर नित्य
स्थित रहो और युगादिनाथ जिनेश्वर की त्रिकाल पूजा करना।
यात्रा के लिए आये हुए भव्य जीवो का मनोवाछित पूर्ण करना
और सकल सघ के विघ्नो को दूर करना।
यक्षाधिप गुरु-वचनो को स्वीकार कर उनकी चरण-वन्दना
करके विमलगिरि-शिखर पर गया और गुरु महाराज द्वारा उप-
दिष्ट कार्य करने लगा।
ये अम्बादेवी और यक्षराज कपर्दि के कल्पयुग्म श्री जिनप्रभ
सूरि ने वृद्ध-वचनानुसार लिखे हैं।
कपर्दि यक्ष-कल्प पूर्ण हुआ इसकी ग्रन्थ सख्या ४२ है।

१२२ विविध तीर्थ-कल्प
हरिकेली गाँव फिर से बसा, गोष्टिक श्रावक आये। भगवत
की भग्न प्रतिमा को देखकर परस्पर कहने लगे—अहो ! महान्
महत्त्वशाली भगवान का म्लेच्छो ने भंग कैसे कर दिया ? फिर
क्या भगवत की वैसी कला नही रही ?
उन लोगो के सोने पर अधिष्ठायक देव ने स्वप्न मे आदेश
दिया कि इस प्रतिमा के सभी टुकडो को एकत्र करके गर्भगृह मे
स्थापित कर कपाट बंध करके ताले लगा दो। छ मास तक इसी
तरह प्रतिपालन करना, उसके पश्चात् द्वार खोलकर प्रतिमा को
संपूर्ण अंगोपांग युक्त अखंड देखना। गोष्ठी लोगो ने भोग-पूजा
करके वैसा ही किया। पाँच मास बीतने पर छठे महीने के प्रारभ
मे उत्सुकता के वशीभूत होकर गोष्टिक लोगो ने द्वार खोल दिए।
उन्होने देखा भगवत के सम्पूर्ण अंगोपांग युक्त होने पर भी स्थान
स्थान पर मसे बने हुए है। उन लोगो ने तत्त्व-विचार न कर
सुथार को बुलाया। उसने टकी के द्वारा मसो को तोडना प्रारभ
किया तो मसो से रुधिर निकलने लगा। गोष्टिक लोगो ने भय-
भीत होकर भोग-पूजादि प्रारभ किया।
रात्रि मे अधिष्ठायक देव ने आदेश किया—तुम लोगो ने यह
गोभनीय कार्य नही किया कि छ मास पूर्ण हुए बिना ही द्वार
खोल डाला, फिर टंकिया भी चलाई। अब फिर जब तक अंतिम
मास पूर्ण हो हमारा द्वार बन्द कर दो। उन्होने उसी प्रकार
किया। छ मास के अनन्तर विधिपूर्वक द्वार खोल कर देखा तो
पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा को निरुपहत अखण्ड अङ्गोपाङ्ग-
युक्त पाया। केवल नख सूक्ति और अंगुष्ठ पर तुच्छ दाग रह गया
था। गोष्टिक लोग सन्तुष्ट होकर पूर्ववत् पूजा करने लगे। चारों
दिशाओ से संघ आकर यात्रा-महोत्सव करता है। इस प्रकार
चमत्कारी माहात्म्य के निधान श्री पार्श्वनाथ भगवान है।

कपर्द्दियक्ष-कल्प १२३
यह हरिकंखी नगर स्थित अश्वसेननन्दन पार्श्वनाथ भगवान
का कल्प संक्षेप से श्री जिनप्रभसूरि ने बनाया है।
हरिकंखी नगर स्थित श्री पार्श्वनाथ का कल्प संपूर्ण हुआ।
इसकी ग्रन्थ सख्या २५ है।
३० कपर्द्दियक्ष-कल्प
श्री शत्रुञ्जय शिखर पर स्थित श्री ऋषभदेव जिनेश्वर को
नमस्कार करके उन्ही के सेवक कपर्दि यक्ष का कल्प कहता हू।
वालवक जनपद मे पालीताना नामक नगर है। वहाँ कवड्डि-
कपर्दि नामक ग्राममहत्तर—सरपच प्रधान था। वह मद्य मास,
जीवहिंसा, परद्रव्यहरण, परस्त्रीगमनादि पाप कार्यों मे आसक्त
चित्त था और अपने अनुरूप चेष्टावाली अणही नामक भार्या के
साथ विषय-सुख उपभोग करता हुआ काल निर्गमन करता था।
एक दिन वह मच पर बैठा था तब उसके घर साधु-युगल आये।
उसने भी देखकर उन्हे प्रणाम करते हुए हाथ जोड कर कहा—
भगवन् ! आपका किस कारण से पधारना, हुआ ? हमारे घर मे
दूध, दही, घी, तक्र आदि प्रचुर हैं, जो चाहिए, आज्ञा कीजिए।
साधुओ ने कहा—हम भिक्षा के लिए नही आये है, परन्तु हमारे
गुरु महाराज सपरिवार शत्रुञ्जय यात्रार्थ पधारे है। अब वर्षा-
काल आ गया और साधु-विहार अकल्प्य है, अतः तुम्हारे पास

१२६ विविध तीर्थ-कल्प
३१. शुद्धदन्तीस्थित पार्श्वनाथ-कल्प
पूर्वकाल मे अयोध्यानगरी मे दशरथनन्दन श्रीपद्म नामक
आठवे वलदेव जो परम सम्यग्दृष्टि थे, उन्होने अनेकग दृष्ट
प्रत्यय, अनेक विघ्नापहारिणी अनागत तीर्थंकर श्री पार्श्वनाथ की
रत्नमय प्रतिमा निज देवतावसर—गृह चैत्यालय मे चिरकाल
पूजा की ।
कालक्रम से पूर्वदेग मे "पद्माकर अपद्मा" अर्थात् दुर्भिक्ष होना
इत्यादि ज्ञात कर दूषमकाल मे धर्म प्रवृत्ति तुच्छतर होने वाली
जानकर अधिष्ठायक देव गगन मार्ग से सात सौ देग के शुद्धदन्ती-
नगर मे लाकर उसे भूमिगृह मे रखा । काल की विषमता जान
कर उन्होने रत्नमयत्व वदल कर उम प्रतिमा को पाषाणमय
वना दिया ।
वहुत सा काल अतिक्रमण होने पर सोधत्तिवाल गच्छ मे
विमलसूरि नामक आचार्य हुए । उन्हे रात्रि मे स्वप्नादेश हुआ
कि यहाँ अमुक प्रदेश मे भूमिगृह मे भगवान पार्श्वनाथ स्वामी की
प्रतिमा विद्यमान है उसे वाहर निकाल कर पूजाओ ! तव उन्होने
श्रावकसघ को आदेश दिया । उन्होने भूमिगृह से उस प्रतिमा को
वाहर निकाला और चैत्यालय वनवा कर वहाँ स्थापित किया ।
त्रिकाल पूजा होने लगी । काल के प्रभाव से नगरी उजड जाने
पर एकवार अधिष्ठायको के प्रमाद से प्रसंगवश आये हुए तुर्को
ने भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा को देखा । वे अनार्य चर्या वाले
होने से प्रतिमा के मस्तक को उतार कर जमीन पर गिरा गये ।
उस समय वहाँ आये हुए वकरियाँ चराने वाले एक अजापालक
ने प्रभु के मस्तक को भूमि पर पडा हुआ देखा ओर बहुत विचार
कर के मस्तक को स्वामी के गरीर पर चढ़ा दिया । वह सल-

अवन्ती देशस्थ अभिनन्दनदेव-कल्प १२७
सधि रहित संलग्न हो गया—अच्छी तरह जुड गया। उस देव-
तानुभाव से आज भी भगवान उसी प्रकार पूजे जाते विद्यमान है।
गुद्धदन्ती नगरी स्थित श्री पार्श्वनाथ देव का यह कल्प श्री
जिनप्रभ सूरि-ने जैसा सुना वैसा वर्णन किया।
■
३२. अवन्तीदेशस्थ अभिनंदनदेव-कल्प
अवन्ती देश के प्रसिद्ध सिद्ध चमत्कारपूर्ण श्री अभिनन्दन
देव का कल्प मै संक्षेप से कहता हूँ। इक्ष्वाकु वंश के मुक्तामणि
श्री संवर राजा के पुत्र, सिद्धार्थ रानी की कुक्षी-सरोवर के राज-
हंस, कपिलाछन और स्वर्ण जैसे वर्ण वाले, अपने जन्म से कोशल
पुर—अयोध्या को पवित्र करने वाले, साढे तीन सौ धनुप काय
प्रमाण वाले, चतुर्थ तीर्थंकर श्रीमान् अभिनन्दनदेव प्रभु का चैत्य
मालव देशान्तर्गत मगलपुर के निकट महाअटवी के बीच मेदपल्ली
मे था। वहाँ विचित्र पाप कर्म निर्माण मे कर्मठ मेव जाति के
लोग निवास करते हैं। एक बार विशाल म्लेच्छ सेना ने आकर
जिनालय को भग्नकर डाला और कलिकाल दुर्ललित कलनीयता
और अधिष्ठायको के प्रमाद से उस चैत्य के अलङ्कारभूत, नम-
स्कार करने वाले जनो के उपद्रव दूर करने वाले भगवान अभि-
नदन जिनेश्वर की प्रतिमा के नौ खण्ड कर डाले, कुछ लोग सात
खड भी कहते हैं। मेव लोगो ने खेद खिन्न चित्त से उन सब
पाषाण खण्डो को एकत्र कर के एक प्रदेश मे रख दिए।

१२८ विविध तीर्थ-कल्प
इस प्रकार बहुत सा समय व्यतीत हो जाने पर, उज्ज्वल
गुण ग्राम से अभिराम, गँव लोगो को तिरस्कृत करने वाला
धारोड गँव से वडजा नामक एक व्यापार-कुगल वणिक नित्य
वहाँ आकर वस्तु क्रय-विक्रय रूप व्यापार किया करता था । वह
परम जैन था । और वह प्रतिदिन घर आकर देवपूजा करता,
विना देव पूजा किये वह कभी भोजन नही करता था । अतः
पल्ली मे आए हुए सेठ को एक वार अनेक दारुण कर्म करने वाले
उन लोगो ने कहा—आप प्रतिदिन आने जाने का कष्ट न कर
इसी वणिकोचित भोज्य से पूर्ण कल्पवल्ली रूप पल्ली मे भोजन
क्यो नही करते ? वणिक ने कहा—ठाकुरो ! जब तक मैं त्रिभुवन-
पूज्य अर्हन्त देवाधिदेव के दर्शन पूजन न करूँ तब तक भोजन
नही कर सकता । किरातो ने कहा—यदि ऐसा ही देव के प्रति
तुम्हारा निश्चय है तो हम तुम्हारा अभीष्ट देवदर्शन करावेंगे ।
वणिक ने स्वीकार किया । उन किरातो ने उन सात या नौ खण्डो
को यथावस्थित जोड़ कर अभिनन्दन भगवान की प्रतिमा दिखाई ।

अवन्ती देशस्थ अभिनन्दनदेव-कल्प १२९

तब उन्होने उन सात या नौ टुकडो को पूर्ववत् यथावस्थित जोड
कर प्रतिमा प्रकट कर दी । वडजा ने प्रतिमा जुडी हुई देखी और
कलुषितहृदय निषाद लोगो का सस्पर्श ही विषादपूर्ण समझ कर
उस सुश्रावक ने सात्विक रीति से अभिग्रह किया कि जब तक मै
इस प्रतिमा को अखण्ड न देखू तब तक अन्न जल नही लूगा !
सेठ को प्रतिदिन उपवास करते देख उस विम्ब-अभिनदन
स्वामी—के अधिष्ठायक देव ने वडजा को स्वप्न मे कहा—इस
प्रतिमा के नवो खण्डो की सन्धि को चन्दन लेप से पूर्ण करो तो
यह अखण्डता प्राप्त करेगी ! प्रात काल मे उस बुद्धिमान ने प्रमोद-
पूर्वक वैसा ही किया । भगवान की देह अखण्ड हो गई, चन्दन के
लेपमात्र से सारी सन्धियाँ मिल गई । उसने तत्काल विशुद्ध श्रद्धा-
पूर्वक भगवान की पूजा करके भोजन किया । और उस वणिक ने
अत्यन्त हर्षपूर्वक मेव लोगो को गुडादि दिया ।
उसके वाद उस वणिक ने रत्न-प्राप्ति की भाँति अत्यन्त प्रस-
न्नतापूर्वक सूने खेडे मे पीपल वृक्ष के नीचे वेदी वधाकर उस
प्रतिमा को मण्डित किया । तब से श्रावकसघ और चारो वर्ण के
लोग चारो दिशाओ से आकर यात्रोत्सवादि आयोजन करने लगे !
वहाँ अभयकीर्त्ति, भानुकीर्त्ति, आवा, राजकुल, मठपति आचार्य
चैत्यचिन्ता—सार-सभाल करते हैं ।
प्राग्वाट वशावतश थेहा का पुत्र हालाशाह नि सन्तान था ।
उसने पुत्र के लिए मानता की—यदि मेरे पुत्र हो गया तो मै यहाँ
मन्दिर वनवाऊंगा ! क्रमश अधिष्ठायक देव के सान्निध्य से उसके
कामदेव नामक पुत्र हुआ । हालाशाह ने वहाँ ऊँचे शिखर वाला
चैत्य वनवाया । क्रमश भावड शाह की पुत्री कामदेव को पर-
णाई । पिता ने डाहा गाँव से मलयसिंह आदि को बुला कर देवा-
र्चक स्थापित किया । महणिया नामक मेव ने भगवान के उद्देश्य
९

१३० विविध तीर्थ-कल्प
से अपनी अंगुली काट डाली—कि मैं इन भगवान् का अंगुली
काटा सेवक हूँ। भगवान के विलेपन चन्दन लगने से उसके फिर
नई अगुली हो गई।
भगवान को अतिशयवान् सुन कर मालवपति श्री जयसिंह ने
अत्यन्त भक्तिपूर्ण अन्त करण से स्वयं भगवान् अभिनन्दनस्वामी
की पूजा की। देवपूजा के निमित्त मठपति को चौबीस हल की
कृषि-भूमि प्रदान की। अवन्तीपति ने देवार्चक को भी बारह हल
की भूमि दी। आज भी अभिनन्दनभगवान का प्रभाव दिग्मण्डल
मे व्याप्त है और उसी प्रकार पूजे जाते हैं।
अभिनन्दनदेव का यह कल्प जैसा सुना, सक्षेप से श्रीजिन-
प्रभ सूरि ने रचा है।
इसकी ग्रन्थ सख्या ५३ और १८ अक्षर ऊपर है !
३३. प्रतिष्ठानपुर-कल्प
श्री मुनि सुव्रत जिन को नमस्कार कर पृथ्वी मे प्रतिष्ठा प्राप्त
प्रतिष्ठानपुर का कल्प यथाश्रुत कहता हूँ। इसी भारत वर्ष मे
दक्षिण खण्ड महाराष्ट्र देशावतश श्रीमतप्रतिष्ठान नामक पत्तन है।
वह अपनी समृद्धि से इन्द्रपुरी को लज्जित करने वाला नगर भी
कालान्तर मे एक छोटा-सा ग्राम प्राय रह गया। एक बार वहाँ
दो विदेशी ब्राह्मण अपनी विधवा वहिन के साथ आकर किसी

प्रतिष्ठानपुर-कल्प १३१
कुंभार की शाला में रहे। वे कणवृत्ति करके कण लाकर अपनी
बहिन को देते और उससे की हुई रसोई से आहार कर अपना
समय निकालते थे। एक दिन वह ब्राह्मणो की बहिन पानी लाने
के लिए गोदावरी नदी गई। उसके अद्वितीय रूप को देख कर
कामातुर अन्तर्ह्रद निवासी शेष नामक नागराज ने ह्रद से निकल
कर मनुष्य देह धारण कर उसके साथ सभोग-केलि की। उसके मप्त-
धातुरहित होने पर भी भवितव्यतावश दिव्य शक्ति से शुक्र पुद्गल
सचार द्वारा गर्भाधान हो गया। नागराज अपना नाम प्रकाशित
कर—सकट के समय मुझे स्मरण करना—ऐसा कह कर पाताल
लोक चला गया। वह भी अपने घर लौट आई पर उसने अपने
भ्राताओ को लज्जावश अपना वृत्तान्त नही बतलाया। कालक्रम
से उस पेट वाली के गर्भलिंग देख कर दोनो भ्राताओ ने जाना
कि यह गर्भवती हो गई मालूम देती है। बडे भाई के मन मे ऐसी
शका हो गई कि यह अवश्य ही छोटे भाई से उपभुक्त हुई है। वडे
भाई के शकाशील भावो से छोटे के चित्त मे भी विकल्प हुआ कि
यह अवश्य वडे के साथ शीलभ्रष्ट हुई है। इस प्रकार परस्पर
कलुषित आशय से वे दोनो उसे छोड कर अलग-अलग देशान्तर
चले गए।
इधर वह बढते हुए गर्भ वाली बहिन भी पराये घरो मे काम
करके अपनी उदरपूर्त्ति करने लगी। क्रमश पूरे दिन होने से उसने
सर्व लक्षणो से युक्त पुत्र को जन्म दिया। और वह क्रमश शरीर
एव गुणो मे बढते हुए समवयस्क बालको के साथ खेला करता।
वह उन्हे बाल-क्रीडा मे हाथी-घोडा-रथ आदि कृत्रिम नाम देकर
वाहन बनाता और स्वय राजा बन जाता। वाहनो का नाम देने
के कारण लोगो से उसने "सातवाहन" नाम पाया। अपनी जननी
द्वारा पालन होते हुए वह सुख से रहने लगा।
इधर उज्जैन मे अवन्तीपति श्री विक्रमादित्य की सभा में

१३२ विविध तीर्थ-कल्प
किसी नैमित्तिक ने "सातवाहन प्रतिष्ठानपुर मे होने वाला राजा
है" बतलाया । अब उसी नगर मे एक वृद्ध ब्राह्मण ने अपना आयु-
शेष ज्ञात कर अपने चारो पुत्रो को बुला कर कहा कि—वत्स !
मेरे परलोक जाने पर, मेरी शय्या के सिरहाने के दक्षिण पाये से
लेकर चारो ही पायो के नीचे चार निधि-कलग वर्त्तमान हैं, उन्हे
ज्येष्ठ-क्रमानुसार विभाग करके ले लेना जिसमे तुम लोगो का
निर्वाह सपन्न होगा। पुत्रो ने पिता का यह आदेश स्वीकार कर
लिया और मृत्यु होने पर पिता का ऊर्ध्वदैहिक करके तेरहवे दिन
भूमि खनन कर अपने-अपने निधिकलग चारो ने ले लिये । उन्होने
ज्योही उद्घाटित कर देखा तो पहले कलग मे सोना, दूसरे मे
काली मिट्टी, तीसरे के बुश-भूसी और चौथे के कलग मे हड्डियाँ
देखी। तब वे तीनो भाई बडे के साथ विवाद करते हुए कहने लगे
कि हमे भी सोने की पाती बाँट कर दो । उसके वितरण न करने
पर वे अवन्तीपति के न्यायालय मे उपस्थित हुए । वहाँ भी उनके
विवाद का निपटारा नही हुआ तो वे चारो भाई महाराष्ट्र जनपद
मे गए ।
कुमार सातवाहन कुलालशाला मे मिट्टी के हाथी, घोडे, रथ,
सैनिक आदि नये-नये खिलौने बना कर दुर्ललित बालक्रीडा करता
हुआ काल-निर्गमन करता था। वे चारो ब्राह्मणपुत्र भी प्रतिष्ठान-
पत्तन आकर उसी कुलाल चक्रशाला मे ठहरे । उन्हे देख कर
इगिताकारकुशल सातवाहनकुमार ने कहा—अहो ब्राह्मणो !
आप चिन्तातुर दिखायी देते हो। उन्होने कहा—सुभग ! हमारे
मन के अन्दर चिन्ता है, पर आपने कैसे जाना ? कुमार ने कहा—
इगित से क्या नही जाना जा सकता है ? उन्होने कहा—ठीक है,
परन्तु आपके सामने चिन्ता का कारण निवेदन करने से क्या
होगा ? आप तो बालक हैं। कुमार ने कहा—बालक भले हूँ, पर
मुझसे भी आपका साध्य सिद्ध होगा, अत चिन्ता का कारण निवे-
दन करें ।

प्रतिष्ठानपुर-कल्प १३३
उसके वचन-वैचित्र्य से हृत-हृदय ब्राह्मणो ने अपना निधि-
निर्णयार्थ मालवेश परिषद मे गमनादि का सारा वृत्तान्त निवेदन
किया । कुमार ने स्मित अधरो से कहा—ब्राह्मणो ! मै आपके
झगडे का निर्णय करूंगा । सावधान होकर सुनो । जिसे स्वर्ण
वाला कलश दिया वह उसी से निवृत्त हो गया, जिसके कलश मे
काली मिट्टी निकली वह क्षेत्र-केदारादि ले, जिसके तुष-भूसी निकला
वह कोठो मे रहा हुआ सभी धान्य स्वीकार करे और जिसके
हड्डियाँ निकली वह घोडे, गाय, भैस, बैल, दास दासी का स्वामी
हो । यही तुम्हारे पिता का आशय है ।
उज्जैन नगर मे उनके वाद-निर्णय की बात फैली, राजा ने
भी उन्हे बुलाकर कहा—क्या आपका वाद-निर्णय हो गया ?
उन्होने कहा—हाँ स्वामिन् ! । राजा द्वारा—“किसने निर्णय
किया ?” पूछने पर उन्होने सातवाहन का सारा स्वरूप सत्य-सत्य
बता दिया ।
राजा ने यह सुन कर सोचा उस बालक का बुद्धि-वैभव भी
अद्भुत है । उसे दैवज्ञ का कथन स्मरण हुआ कि प्रतिष्ठानपुर मे
उसका राज्य होगा अत राजा उसे शत्रु मान कर क्षुब्ध मन से
उसको मारने का उपाय चिरकाल सोचता रहा । शस्त्रादि प्रयोगो
से मारने मे अपयश और क्षात्रधर्म की क्षति सोच कर मालवपति
ने चतुरङ्गिणी सेना सजाई और प्रतिष्ठानपत्तन को जाकर घेर
लिया । यह देख कर त्रस्त ग्राम्यजन सोचने लगे—क्रुद्ध मालवपति
का यह आटोप कोप किस पर हुआ है ? यहाँ न तो कोई राजा
है, न कोई ठाकुर और न कोई वीर या वैसा दुर्ग ही है । उन लोगों
के इस प्रकार की चिन्ता करते समय मालवेश के दूत ने आकर
सातवाहन से कहा—अरे कुमार ! तुम्हारे पर राजा क्रुद्ध है और
कल तुम्हे मारेगा अत तुम्हे युद्धादि उपाय सोचना उचित है !
दूत की बात सुन कर भी वह निर्भयतापूर्वक खेलने मे लगा रहा ।

इसी बीच परमार्थ ज्ञात कर उसके दोनो मामा दुर्विकल्प त्याग
कर पुन प्रतिष्ठान आ गए थे । उन्होने परचक्र देख कर बहिन से
कहा—बहिन । जिसने तुम्हे यह पुत्र दिया है उसे ही स्मरण करो,
ताकि वही इसका सहायक होगा ।
भ्राताओ के कथन से वह भी नागराज के वचनो को स्मरण
कर शिर पर घड़ा लेकर गोदावरी मे नागह्रद पर गई । नहा कर
नागराज की आराधना की । नागराज ने तत्काल प्रत्यक्ष होकर
कहा—ब्राह्मणी ! तुमने हमे किस लिए याद किया ? उसके प्रणाम
करके सारी बात बताने पर शेषराज ने मेरे प्रताप से तुम्हारे पुत्र
का कौन पराभव कर सकता है ?—कहते हुए उसका घड़ा लेकर
ह्रद के अन्दर गया और पीयूष कुण्ड से अमृत का घडा भर कर
उसे ला दिया । उसने कहा—इस अमृत से सातवाहन के बनाये
हुए मिट्टी के घोडे, रथ, हाथ व सैनिक अभिसिंचित करो जिससे
वे सजीव होकर शत्रु सेना को भग्न कर डालेगे । यह पीयूष-घट
ही तुम्हारे पुत्र को प्रतिष्ठानपत्तन के राज्याभिषिक्त करेगा !
अवसर पर मुझे याद करना । इसके वाद नागराज अपने स्थान
चला गया । वह भी अमृतघट को लेकर अपने घर आई और उस
मिट्टी की समृद्ध सेना को सीचा । प्रात काल देवशक्ति से वह सेना
सचेतन होकर शत्रु सेना के सामने जाकर उसके साथ युद्ध करने
लगी ।
सातवाहन की सेना ने मालवपति का बल भग्न कर दिया ।
राजा विक्रमादित्य भी भग कर अवन्ती चला गया । इसके पश्चात्
सानवाहन राज्याभिषिक्त हुआ । प्रतिष्ठानपुर ने अपनी पूर्व विभूति
पुन प्राप्त की । वहाँ हाट, हवेली, मन्दिर, राजमार्ग, खाई, प्राकार
आदि से सुशोभित सुन्दर पत्तन हो गया । सातवाहन ने भी क्रमश
दक्षिणापथ को तापी तट पर्यन्त अनृण करके उत्तरापथ को साध

प्रतिष्ठानपुराधिपति सातवाहन नृप-चारित्र १३५
कर अपना सवत्सर प्रवर्त्तित किया। वह जैन हुआ, उसने जन-
नयनशीतलकारी जिन-चैत्य बनवाये। पचास वीरो ने भी प्रत्येक
ने अपने अपने नामाङ्कित जिनालय नगर मे कराये।
प्रतिष्ठानपत्तन कल्प समाप्त हुआ, इसकी श्लोक सख्या ४७ है।
३४. प्रतिष्ठानपुराधिपति सातवाहन
नृप चरित्र
अब प्रसङ्गवश अन्य दर्शनियो के सिद्धातो मे लोकप्रसिद्ध
सातवाहन का शेष चरित्र भी कुछ कहते हैं। श्री सातवाहन जब
पृथ्वी का पालन कर रहे थे उस समय प्रतिष्ठाननगर मे पचास
वीर और बाहर भी पचास वीर निवास करते थे। इधर इसी नगर
मे एक ब्राह्मण का शूद्रक नामक अभिमानी पुत्र था, वह भी दर्प
पूर्वक युद्ध-श्रम करता रहता था जो पिता द्वारा अपने कुल के
लिये अनुचित बतलाकर निषेध करने पर भी नही मानता था।
एक दिन पिता के साथ जाते हुए बारह वर्षीय शूद्रक ने देखा
राजा सातवाहन नगर मे रहने वाले वापला, खूदला आदि पचास
वीरो के साथ व्यायाम करते हुए बावन हाथ प्रमाण वाली शिला
को उठा रहे थे। किसी वीर ने चार अगुल, किसी ने छ अगुल
और किसी ने आठ अंगुल भूमि से शिला को ऊँची उठाया। राजा
ने जानु तक ऊँचा उठा लिया। यह देखकर बल जागृत होने मे

१३६ विविध तीर्थ-कल्प

शूद्रक बोला—अहो ! क्या आप लोगो मे से कोई इस शिला को
मस्तक तक नही उठा सकता ? उन लोगो ने ईर्ष्यापूर्वक कहा—
यदि अपने को समर्थ मानते हो तो तुम्ही उठाओ। यह सुनकर
शूद्रक ने उस शिला को आकाश मे उछाला जो दूर तक ऊँची
चली गई। शूद्रक ने कहा—आप लोगो मे जो समर्थ हो वह इस
गिरती हुई शिला को रोक ले ! सातवाहनादि वीरो ने भयाक्रान्त
नेत्रो से उसी से अनुनयपूर्वक कहा—अहो महाबली ! हमारे प्राणो
की रक्षा करो ! रक्षा करो ! शूद्रक ने उस गिरती हुई शिला को
मुष्टिप्रहार किया जिससे उसके तीन टुकडे हो गए। उनमे एक
टुकडा तीन योजन पर जाकर गिरा, दूसरा टुकडा नागहृद मे
और तीसरा टुकडा प्रतोली द्वार के चौरस्ते पर जाकर गिरा जो
आज भी वैसे ही लोगो द्वारा देखा जाता है।
शूद्रक के बल से चमत्कृत होकर राजा ने उसे अत्यन्त सम्मान-
पूर्वक नगर का आरक्षक नियुक्त कर दिया। अन्य शस्त्रास्त्रो का
प्रतिषेध कर उस दण्ड धारण करने वाले का दण्ड हो आयुध बना।
वह शूद्रक भी वाहर रहने वाले वीरो को अनर्थ निवारण करने के
उद्देश्य से नगर मे प्रविष्ट नही होने देता था।
एक वार अपने महल के छत पर सोया हुआ राजा सातवाहन
शरीर-चिन्ता के लिए उठा। उसने नगर के वाह्य भाग मे करुण
रुदन सुना तो पराये दुख से दुखी हृदय से वह तलवार लेकर घर
से निकल पडा। रास्ते मे शूद्रक ने देखा और विनयपूर्वक नमस्कार
कर अर्द्धमहानिशा मे निकल पडने का कारण पूछा। राजा बोले—
यह नगर के समीप करुण क्रन्दन की ध्वनि सुनाई दे रही है इसका
कारण जानने के लिए मैं जा रहा हूँ। राजा के ऐसा कहने पर
शूद्रक ने निवेदन किया—देव ! आप प्रतीक्षा करते हुए भवन को
अलंकृत करने पधारिये, मैं ही उसकी खोज कर आऊँगा। ऐसा
कह कर राजा को लौटा दिया और स्वय गगन-ध्वनि के अनुसार

प्रतिष्ठानपुराधिपति सातवाहन नृप-चरित्र १३७

नगर के बाहर जाने लगा । आगे कान लगाकर चलते हुए उसने
सुना कि कोई गोदावरी के स्रोत मे रो रहा है । शूद्रक परि-
करबद्ध होकर तिरता हुआ ज्योही नदी के बीच मे पहुँचा, त्योही
प्रवाह मे बहते हुए और रोते हुए एक पुरुष को देखकर वह
बोला—अरे ! तुम कौन हो ? किस लिए रो रहे हो ? यह सुनकर
वह और भी ज़ोर-ज़ोर से रुदन करने लगा । अत्यन्त आग्रह से
पूछने पर वह स्पष्ट बोला—हे साहसिकशिरोमणि ! मुझे यहाँ से
निकाल कर राजा के समीप ले चलो, जिससे मै वहाँ अपना
वृत्तान्त कहूँ ।
उसके ऐसा कहने पर शूद्रक ने उसे उठाने का प्रयत्न किया
किन्तु वह उठ न सका । शूद्रक ने सोचा—कही नीचे से किसी
राक्षस ने न पकड-रखा हो । इस आशंका से उसने तलवार चलाई
तब मात्र शिर को वह ऊचा उठा पाया । हाथ मे आया हुआ शिर
छोटा सा था और उसमे से रुधिर झर रहा था । उसे देख कर
शूद्रक विषादपूर्ण होकर सोचने लगा—अहो ! प्रहार न करने वाले
पर भी प्रहार करने वाले मुझको धिक्कार है, मै शरणागत का
घातक हूँ । इस प्रकार आत्मनिन्दा करता हुआ वह वज्राहत के
समान क्षण भर के लिए मूर्छित हो गया । तत्पश्चात् चेतना आने
पर वह चिरकाल चिन्ता करने लगा कि मै अपनी इस दुश्चेष्टा को
को राजा से कैसे निवेदन करूंगा । इस प्रकार लज्जित मन से
वही काष्ठ की चिता बना कर उसमे अग्नि प्रज्वलित कर ज्यो ही
मस्तक को लेकर प्रवेश करने लगा, त्यो ही मस्तक ने कहा—हे
महापुरुष ! ये साहस आप क्यो कर रहे हैं। मैं तो राहु के समान
शिरमात्र ही हूँ ! अत वृथा खेद मत करो । और कृपा कर मुझे
राजा के पास ले चलो । उसकी यह बात सुन चमत्कृत चित्त मे—
यह प्राणी है—ऐसा मानता हुआ प्रसन्नता से शूद्रक उस शिर को
रेशमी कपडे मे लपेट कर प्रात काल सातवाहन राजा के पास

१३८ विविध तीर्थ-कल्प

पहुँचा । नमस्कार किया । राजा ने पूछा—शूद्रक ! यह क्या है ?
वह बोला—देव ! यह वही है जिसकी रुदन-ध्वनि श्रीमान् ने
रात्रि मे सुनी थी । फिर उसने उसका सारा वृतान्त निवेदन कर
दिया ।
राजा ने उस मस्तक से पूछा—अहो ! तुम कौन हो ? किस
लिए यहाँ आना हुआ ? मस्तक ने कहा—महाराज ! आपकी
कीर्ति दोनो कानो से सुन कर करुण रुदन के छल से अपने को
जतला कर मैं आपके पास आया हूँ । आपके दर्शन किए, आज मेरे
उभय नेत्र कृतार्थ हुए ! राजा ने पूछा—तुम कौनसी कला ठीक
ढंग से जानते हो ? उसने कहा—देव ! मैं संगीत कला जानता हूँ !
फिर राजा की आज्ञा से पहले नही गाया हुआ गीत गाने लगा !
उसकी गायन-कला से सारी राजसभा मोहित हो गई । वास्तव मे
वह मायासुर नाम का असुर था और वैसी माया बना कर राजा
की रानी, जो अत्यन्त रूपवती थी उसका हरण करने के लिए
आया हुआ था । पर यह किसी को पता नही लगा । लोगो ने तो
शिरमात्र देखने से उसका नाम प्राकृत—लोक भाषा मे सीपुला रख
दिया । तब से प्रतिदिन उस तुम्बुरु के द्वारा मधुरतर गाते रहने
पर उसका सारा स्वरूप महादेवी ने सुना और दासी के द्वारा
राजा को निवेदन कर उस शिर को अपने पास मगवाया ।
रानी प्रतिदिन उससे संगीत सुनने लगी ।
कुछ दिन बाद मायासुर ने अवसर पाकर रानी का अपहरण
कर लिया और अपने घण्टावलम्बी नामक विमान मे उसे चढा
लिया । रानी करुण क्रन्दन करने लगी—हाय, मेरा किसी ने अप-
हरण कर लिया, पृथ्वी पर क्या कोई ऐसा वीर है जो मुझे छुडा
ले ! खुहला वीर ने रानी की यह पुकार सुन कर दौडते हुए
आकाश मे उछल कर उस विमान का घटा अपने हाथ से दृढता