विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकपर्द्दियक्ष-कल्प १२३
यह हरिकंखी नगर स्थित अश्वसेननन्दन पार्श्वनाथ भगवान
का कल्प संक्षेप से श्री जिनप्रभसूरि ने बनाया है।
हरिकंखी नगर स्थित श्री पार्श्वनाथ का कल्प संपूर्ण हुआ।
इसकी ग्रन्थ सख्या २५ है।
३० कपर्द्दियक्ष-कल्प
श्री शत्रुञ्जय शिखर पर स्थित श्री ऋषभदेव जिनेश्वर को
नमस्कार करके उन्ही के सेवक कपर्दि यक्ष का कल्प कहता हू।
वालवक जनपद मे पालीताना नामक नगर है। वहाँ कवड्डि-
कपर्दि नामक ग्राममहत्तर—सरपच प्रधान था। वह मद्य मास,
जीवहिंसा, परद्रव्यहरण, परस्त्रीगमनादि पाप कार्यों मे आसक्त
चित्त था और अपने अनुरूप चेष्टावाली अणही नामक भार्या के
साथ विषय-सुख उपभोग करता हुआ काल निर्गमन करता था।
एक दिन वह मच पर बैठा था तब उसके घर साधु-युगल आये।
उसने भी देखकर उन्हे प्रणाम करते हुए हाथ जोड कर कहा—
भगवन् ! आपका किस कारण से पधारना, हुआ ? हमारे घर मे
दूध, दही, घी, तक्र आदि प्रचुर हैं, जो चाहिए, आज्ञा कीजिए।
साधुओ ने कहा—हम भिक्षा के लिए नही आये है, परन्तु हमारे
गुरु महाराज सपरिवार शत्रुञ्जय यात्रार्थ पधारे है। अब वर्षा-
काल आ गया और साधु-विहार अकल्प्य है, अतः तुम्हारे पास