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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 203

१२० विविध तीर्थ-कल्प
उसी नगर का महाराजा हो गया । यादव वंश बीज का वहाँ
उद्धार हुआ जिससे उसने बहुमानपूर्वक चन्द्रप्रभ स्वामी के मन्दिर
का उद्धार कराया । इस प्रकार त्रेता युग का उद्धार हुआ, ऐसे
तीनो युगो मे वहाँ अनेक उद्धार हुए ।
वर्त्तमान कलिकाल मे श्री शान्तिसूरि ने उद्धार करवाया ।
पहले कल्याणकटक नगर मे परमर्दी नामक राजा राज्य करता
था । उस जिनेन्द्र भक्त ने वहाँ के प्रासाद मे चन्द्रकान्त मणिमय
विम्व सुनकर विचार किया कि मै इस प्रतिमा को अपने घर लाकर
गृह चैत्यालय मे पूजा करूंगा । नाशिक के नागरिको ने इसका
कथंचित् व्यतिकर जानकर ताम्रसम्पुट मे उस बिम्ब को निक्षिप्त
कर के ऊपर लेप कर दिया, लेपमय प्रतिमा हो गई । राजा ने
जिनालय मे आने पर जब उस प्रतिमा को न देखा तो लोगो से
पूछा । उनके यथास्थित कहने पर राजा ने सोचा—इस लेप को
भेदन कर मूल प्रतिमा को निकालूगा । फिर राजा ने उस मन्दिर
का उद्धार कराने के लिए चौवीस गाँव अर्पण किये । उसके द्रव्य
से देवाधिदेव पूजे जाते हैं ।
इसके बाद कितना ही समय बीतने पर निकटवर्त्ती त्र्यम्बक-
देवाधिष्ठित महादुर्ग ब्रह्मगिरि स्थित महल्लय क्षत्रिय जाति का
वाइओ नामक डाकू था जिसने प्रासाद को गिरा दिया । यह सुन
कर पल्लीवाल-वंशावतंश ईश्वर के पुत्र माणिक्य के जो नाऊ की
कुक्षि-सरोवर के राजहंस सदृश था—उस कुमारसिंह परम श्रावक
ने पुन भव्य प्रासाद करवाया । अपने न्यायोपार्जित द्रव्य को सफल
कर उसने अपने को भवसागर से पार किया ।
इस प्रकार अनेक उद्धार वाले नाशिक महातीर्थ की आज भी
यात्रा-महोत्सव करने के लिए चतुर्दिशाओ से सघ आकर आरा-
धना करता है । वे कलिकाल के दर्प को विनष्ट करने वाले भगवान
के शासन की प्रभावना करते हैं ।