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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

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पृष्ठ 211

१२८ विविध तीर्थ-कल्प
इस प्रकार बहुत सा समय व्यतीत हो जाने पर, उज्ज्वल
गुण ग्राम से अभिराम, गँव लोगो को तिरस्कृत करने वाला
धारोड गँव से वडजा नामक एक व्यापार-कुगल वणिक नित्य
वहाँ आकर वस्तु क्रय-विक्रय रूप व्यापार किया करता था । वह
परम जैन था । और वह प्रतिदिन घर आकर देवपूजा करता,
विना देव पूजा किये वह कभी भोजन नही करता था । अतः
पल्ली मे आए हुए सेठ को एक वार अनेक दारुण कर्म करने वाले
उन लोगो ने कहा—आप प्रतिदिन आने जाने का कष्ट न कर
इसी वणिकोचित भोज्य से पूर्ण कल्पवल्ली रूप पल्ली मे भोजन
क्यो नही करते ? वणिक ने कहा—ठाकुरो ! जब तक मैं त्रिभुवन-
पूज्य अर्हन्त देवाधिदेव के दर्शन पूजन न करूँ तब तक भोजन
नही कर सकता । किरातो ने कहा—यदि ऐसा ही देव के प्रति
तुम्हारा निश्चय है तो हम तुम्हारा अभीष्ट देवदर्शन करावेंगे ।
वणिक ने स्वीकार किया । उन किरातो ने उन सात या नौ खण्डो
को यथावस्थित जोड़ कर अभिनन्दन भगवान की प्रतिमा दिखाई ।