विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहरिकंखी नगर स्थित पार्श्वनाथ-कल्प १२१
पौराणिक परमतीर्थ नाशिकपुर का यह कल्प है इसे वाचने-
पढने वालो को वांछित ऋद्धि सप्राप्त होती है।
कुछ अन्य दर्शनियो के मुख से कुछ जैन पुरातत्त्वविदो के
मुखँ से श्रवण कर श्री जिनप्रभसूरि ने नाशिकपुर का यह कल्प
लिखा है।
श्री नाशिक्यपुर का कल्प समाप्त हुआ। इसकी श्लोक-सख्या
५९ और २७ अक्षर हैं।
२९. हरिकंखीनगर स्थित पार्श्वनाथ-कल्प
हरिकंखी नगरी के चैत्य मे निविष्ट पार्श्वनाथ स्वामी को
नमस्कार करके कलिकाल के दर्प को नष्ट करने वाला वहाँ का
थोडा कल्प कहता हू।
गुर्जर धरा मे हरिकंखी नामका सुन्दर गाँव है। वहाँ उत्तुंग
शिखर वाले जिनालय मे प्रातिहार्यसन्निहित श्री पार्श्वनाय-प्रतिमा
भव्यजनो द्वारा विविध पूजाओ से त्रिकाल पूजी जाती है। एकवार
चालुक्यवशप्रदीप श्री भीमदेव के राज्य मे तुर्क मण्डल से सबल
सैन्य सहित आये हुए अतनुवुक्का नामक सलार ने अणहिलवाडा
पाटणगढ को भग किया। उसने वहाँ से लौटते हुए हरिकंखी
गाँव के चैत्य को देखा और प्रविष्ट होकर पार्श्वनाथ प्रतिमा को
भग्न कर डाला। उसके पश्चात् गाँव मे उपद्रव करके सलार
स्वस्थान की ओर चला गया।