विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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३१. शुद्धदन्तीस्थित पार्श्वनाथ-कल्प
पूर्वकाल मे अयोध्यानगरी मे दशरथनन्दन श्रीपद्म नामक
आठवे वलदेव जो परम सम्यग्दृष्टि थे, उन्होने अनेकग दृष्ट
प्रत्यय, अनेक विघ्नापहारिणी अनागत तीर्थंकर श्री पार्श्वनाथ की
रत्नमय प्रतिमा निज देवतावसर—गृह चैत्यालय मे चिरकाल
पूजा की ।
कालक्रम से पूर्वदेग मे "पद्माकर अपद्मा" अर्थात् दुर्भिक्ष होना
इत्यादि ज्ञात कर दूषमकाल मे धर्म प्रवृत्ति तुच्छतर होने वाली
जानकर अधिष्ठायक देव गगन मार्ग से सात सौ देग के शुद्धदन्ती-
नगर मे लाकर उसे भूमिगृह मे रखा । काल की विषमता जान
कर उन्होने रत्नमयत्व वदल कर उम प्रतिमा को पाषाणमय
वना दिया ।
वहुत सा काल अतिक्रमण होने पर सोधत्तिवाल गच्छ मे
विमलसूरि नामक आचार्य हुए । उन्हे रात्रि मे स्वप्नादेश हुआ
कि यहाँ अमुक प्रदेश मे भूमिगृह मे भगवान पार्श्वनाथ स्वामी की
प्रतिमा विद्यमान है उसे वाहर निकाल कर पूजाओ ! तव उन्होने
श्रावकसघ को आदेश दिया । उन्होने भूमिगृह से उस प्रतिमा को
वाहर निकाला और चैत्यालय वनवा कर वहाँ स्थापित किया ।
त्रिकाल पूजा होने लगी । काल के प्रभाव से नगरी उजड जाने
पर एकवार अधिष्ठायको के प्रमाद से प्रसंगवश आये हुए तुर्को
ने भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा को देखा । वे अनार्य चर्या वाले
होने से प्रतिमा के मस्तक को उतार कर जमीन पर गिरा गये ।
उस समय वहाँ आये हुए वकरियाँ चराने वाले एक अजापालक
ने प्रभु के मस्तक को भूमि पर पडा हुआ देखा ओर बहुत विचार
कर के मस्तक को स्वामी के गरीर पर चढ़ा दिया । वह सल-