विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)
Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri
आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअवन्ती देशस्थ अभिनन्दनदेव-कल्प १२७
सधि रहित संलग्न हो गया—अच्छी तरह जुड गया। उस देव-
तानुभाव से आज भी भगवान उसी प्रकार पूजे जाते विद्यमान है।
गुद्धदन्ती नगरी स्थित श्री पार्श्वनाथ देव का यह कल्प श्री
जिनप्रभ सूरि-ने जैसा सुना वैसा वर्णन किया।
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३२. अवन्तीदेशस्थ अभिनंदनदेव-कल्प
अवन्ती देश के प्रसिद्ध सिद्ध चमत्कारपूर्ण श्री अभिनन्दन
देव का कल्प मै संक्षेप से कहता हूँ। इक्ष्वाकु वंश के मुक्तामणि
श्री संवर राजा के पुत्र, सिद्धार्थ रानी की कुक्षी-सरोवर के राज-
हंस, कपिलाछन और स्वर्ण जैसे वर्ण वाले, अपने जन्म से कोशल
पुर—अयोध्या को पवित्र करने वाले, साढे तीन सौ धनुप काय
प्रमाण वाले, चतुर्थ तीर्थंकर श्रीमान् अभिनन्दनदेव प्रभु का चैत्य
मालव देशान्तर्गत मगलपुर के निकट महाअटवी के बीच मेदपल्ली
मे था। वहाँ विचित्र पाप कर्म निर्माण मे कर्मठ मेव जाति के
लोग निवास करते हैं। एक बार विशाल म्लेच्छ सेना ने आकर
जिनालय को भग्नकर डाला और कलिकाल दुर्ललित कलनीयता
और अधिष्ठायको के प्रमाद से उस चैत्य के अलङ्कारभूत, नम-
स्कार करने वाले जनो के उपद्रव दूर करने वाले भगवान अभि-
नदन जिनेश्वर की प्रतिमा के नौ खण्ड कर डाले, कुछ लोग सात
खड भी कहते हैं। मेव लोगो ने खेद खिन्न चित्त से उन सब
पाषाण खण्डो को एकत्र कर के एक प्रदेश मे रख दिए।