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विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

विविध तीर्थ कल्प (आचार्य जिनप्रभ सूरि - प्राचीन भारतीय तीर्थ, ऐतिहासिक भूगोल व पुराविहार)

Vividha Tirtha Kalpa of Jinaprabha Suri

आचार्य जिनप्रभ सूरि (सम्पादक: मुनि जिनविजय) द्वारा

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 202, कुल 442 में से

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पृष्ठ 202

नाशिकपुर-कल्प ११९

एक दिन गुक्र महाग्रह की पुत्री देवयानी को जनकस्थानपुर
मे खेलते हुए दण्डक राजा ने देखा । रूपवती होने के कारण वला-
त्कार से उसने उसका शीलभग किया । गुक्र महाग्रह को उसका
स्वरूप ज्ञात होने पर उसने रोषवश शाप दिया कि यह नगर
दण्डक राजा सहित सात दिन के भीतर राख का ढेर हो जायगा ।
नारद ऋषि को यह ज्ञात होने पर उसने दण्डक राजा को कहा ।
दण्डक राजा सुन कर भय के मारे सव लोगो को लेकर चन्द्रप्रभ
स्वामी के शरण में आया और शापमुक्त हुआ । उसके वाद नगर
का नाम “जगथाण” प्रसिद्ध हुआ । इस प्रकार परतीर्थी लोग भी
जिस तीर्थ का माहात्म्य बखानते हैं, तो जैन लोग क्यो नही
वर्णन करेंगे ।
इसके पश्चात् द्वापर वृग मे पाण्डु राजा की पत्नी कुन्ती देवी
ने प्रथम पुत्र युधिष्ठिर होने पर चन्द्रप्रभ स्वामी के प्रासाद को
जीर्ण देखकर उद्धार कराया, अपने हाथ से उसने वहाँ विल्व वृक्ष
रोपा । तब वह कुन्ती-विहार नाम से विख्यात हुआ । फिर द्वैपायन
ऋषि के द्वारा द्वारिका का दाह होने पर उपक्षीणप्राय यादव वंश
मे वज्रकुमार नामक यादव क्षत्रिय था जिसकी स्त्री गर्भवती थी ।
वह द्वारिका-दाह होते समय बहुभक्ति पूर्वक द्वैपायन ऋषि से
छूट कर चन्द्रप्रभ स्वामी के शरण मे आई । पूर्ण समय होने पर
वहाँ उसने पुण्यशाली पुत्र प्रसव किया । उसका नाम दृढप्रहारी
दिया गया । वह वाल्यकाल अतिक्रान्त कर तरुणावस्था मे महा-
रथी हो गया । वह अकेला ही लाख सुभटो के साथ युद्ध करने मे
समर्थ था । एक वार वहाँ चोरो ने गायो का हरण किया, उन सव
को अकेला दृढप्रहारो जीत कर लौटा लाया, इससे उसको अत्यन्त
पराक्रमी ज्ञात कर ब्राह्मण आदि नागरिको ने उसे तलार—नगर-
रक्षक पद दिया । उसने चोर डाकुओ का निग्रह किया और क्रमशः